अप्रत्याख्यान कषाय से संयम के भाव नहीं आते: मुनिश्री योगसागर

धर्म

अप्रत्याख्यान कषाय से संयम के भाव नहीं आते: मुनिश्री योगसागर

 

कोटा, 28 सितंबर।

पुण्योदय अतिशय क्षेत्र नसियां जी, दादाबाड़ी में चल रहे चातुर्मास के दौरान सोमवार को मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने अप्रत्याख्यान कषाय, जीवदया और अहिंसा व्रत के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि अप्रत्याख्यान कषाय के कारण व्यक्ति के मन में संयम और त्याग के भाव पैदा नहीं होते। यह कषाय व्यक्ति को संयम के रास्ते से दूर करती है।

 

 

*हर जीव के प्रति रखें दया का भाव*

मुनिश्री ने कहा कि हमें पंचेंद्रिय सहित सभी जीवों के प्रति दया और अहिंसा का भाव रखना चाहिए। जैन धर्म में अहिंसा का मतलब केवल किसी जीव को मारने से बचना नहीं है। मन, वचन और शरीर से किसी जीव को दुख, परेशानी या डर नहीं देना भी अहिंसा है।

 

रत्नकरण्ड श्रावकाचार के श्लोक 53 और 54 का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि हमें स्थूल हिंसा से बचना चाहिए। उन्होंने समझाया कि “जैसे हमें अपने प्राण प्यारे हैं, वैसे ही दूसरे जीवों को भी अपने प्राण प्यारे हैं।” इसी भावना से जीवदया की शुरुआत होती है।

 

 

रोजमर्रा के कामों में भी अहिंसा संभव

मुनिश्री ने कहा कि अहिंसा का पालन केवल मंदिर या पूजा तक सीमित नहीं है। इसे रोजमर्रा की जिंदगी में भी अपनाया जा सकता है। घर में झाड़ू लगाते समय सावधानी रखना, पानी छानकर पीना और बिना वजह किसी जीव को परेशान नहीं करना भी अहिंसा के ही उदाहरण हैं।

 

 

उन्होंने संकल्पी और आरंभी हिंसा का अंतर बताते हुए कहा कि किसी जीव को जान-बूझकर दुख पहुंचाना संकल्पी हिंसा है। वहीं जीवन चलाने के जरूरी कामों में होने वाली हिंसा को भी कम से कम करने की कोशिश करनी चाहिए। “जियो और जीने दो” अहिंसा को जीवन में अपनाने का सरल तरीका है।

*आत्मरक्षा के लिए किया गया प्रतिकार*

मुनिश्री ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति हमला करता है और अपनी रक्षा के लिए उसका प्रतिकार किया जाता है तो इसे विरोधी हिंसा की श्रेणी में समझा जाता है। अहिंसा का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति अपनी रक्षा ही न करे। असली बात यह है कि हमारे मन में मोह, राग और द्वेष के भाव कम हों।

 

 

*कर्मचारियों और सेवकों से भी करें अच्छा व्यवहार*

मुनिश्री ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार के श्लोक 54 का उल्लेख करते हुए कहा कि अहिंसा अणुव्रत का पालन करते समय सावधानी जरूरी है। किसी को चोट पहुंचाना, बांधना, परेशान करना, जरूरत से ज्यादा वजन उठवाना या किसी कर्मचारी और सेवक से उसकी क्षमता से अधिक काम करवाना भी गलत है।

उन्होंने कहा कि अपने कर्मचारियों, सेवकों और आश्रितों के साथ भी सम्मान और करुणा से व्यवहार करना चाहिए।

*अहिंसा पूजा तक सीमित नहीं*

मुनिश्री ने कहा कि अहिंसा केवल पूजा-पाठ का विषय नहीं है, बल्कि यह हमारे व्यवहार का हिस्सा होनी चाहिए। जब व्यक्ति हर जीव में अपने जैसा जीवन समझने लगेगा, तब उसके व्यवहार में अपने आप दया, संयम और प्रेम आने लगेगा।

उन्होंने श्रावकों से कहा कि वे अपने दैनिक जीवन में जीवदया, संयम और सावधानी अपनाएं। साथ ही राग, द्वेष और कषायों को कम करने का लगातार प्रयास करें। इससे अहिंसा केवल एक व्रत नहीं रहेगी, बल्कि जीवन जीने का तरीका बन जाएगी।

अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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