60 लाख साधु-संतों के बावजूद पाप क्यों नहीं हो रहे कम?अंतर्मना प्रसन्न सागर जी महाराज बोले—धर्म की प्रवृत्ति बढ़ी, लेकिन पाप की निवृत्ति नहीं हुई
पांच निर्जल उपवास के बाद आचार्य श्री का सानंद पारणा | 22 दिनों में 16 उपवास की कठिन साधना निरंतर जारी
सोनकच्छ।
भारत की धरती साधु-संतों, ऋषि-मुनियों और तपस्वियों की पावन तपोभूमि रही है। यहां सदियों से सत्य, अहिंसा, संयम और सदाचार का संदेश दिया जाता रहा है। इसके बावजूद समाज में पाप और अनैतिक प्रवृत्तियां कम होने के बजाय लगातार दिखाई दे रही हैं। ऐसे में एक सवाल हर व्यक्ति को आत्ममंथन के लिए मजबूर करता है—जब देश में 60 लाख से अधिक साधु-संत हैं, तो फिर पाप की प्रवृत्ति कम क्यों नहीं हो रही?
इसी गंभीर विषय पर पुष्पगिरी तीर्थ में चातुर्मास प्रवास के दौरान व्रतचक्रवर्ती पट्ट विभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन का संदेश दिया।
आचार्य श्री ने कहा कि धर्म की प्रवृत्ति तो बढ़ रही है, लेकिन पाप की निवृत्ति नहीं हो रही है। व्यक्ति धर्म और सत्संग से जुड़ रहा है, धार्मिक आयोजनों में शामिल हो रहा है, प्रवचन सुन रहा है, लेकिन धर्म को अपने आचरण में उतारने की कमी दिखाई देती है।
धर्म सुनने तक नहीं, जीवन में उतरना चाहिए
अंतर्मना प्रसन्न सागर जी महाराज ने कहा कि धर्म करने के बाद भी यदि मन को शांति नहीं मिलती और चेहरे पर प्रसन्नता दिखाई नहीं देती तो व्यक्ति को धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ, धार्मिक आयोजन या सत्संग सुनने तक सीमित नहीं होना चाहिए। धर्म का प्रभाव व्यक्ति के विचारों, व्यवहार, वाणी और कर्मों में दिखाई देना चाहिए। जब धर्म जीवन का हिस्सा बनेगा, तभी व्यक्ति के भीतर वास्तविक परिवर्तन आएगा।
आचार्य श्री ने कहा कि भगवान ने मनुष्य को विवेक दिया है। वह पाप-पुण्य, उचित-अनुचित और अच्छे-बुरे का अंतर समझता है। पशु के पास यह विवेक नहीं होता, फिर भी वह अपनी प्रकृति के अनुसार जीवन जीता है। मनुष्य सब कुछ जानते और समझते हुए भी यदि गलत कर्म करता है तो यह विचार करने का विषय है कि उसका धर्म से जुड़ाव कितना वास्तविक है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि धर्म को केवल सुनें नहीं, उसे अपने जीवन में उतारें। तभी व्यक्तिगत जीवन में शांति और समाज में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देगा।
पांच निर्जल उपवास के बाद हुआ सानंद पारणा
प्रवक्ता रोमिल जैन ने बताया कि पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता युगप्रधान गणाचार्य श्री 108 पुष्पदंत सागर जी महाराज के शिष्य अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज द्वारा धर्मचक्र व्रत के अंतर्गत कठिन तप-साधना निरंतर जारी है।
इसी क्रम में मंगलवार को पांच निर्जलाहार उपवास के बाद गुरुदेव का सानंद पारणा सम्पन्न हुआ। इस कठिन साधना के प्रति श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह और श्रद्धाभाव देखा गया।
उन्होंने बताया कि गुरुदेव द्वारा 22 दिनों में 16 उपवास की कठिन साधना की जा रही है। तप, त्याग और संयम की इस साधना से श्रद्धालु प्रेरणा ले रहे हैं।
पारणा के अवसर पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री के तप की अनुमोदना करते हुए मंगलकामनाएं व्यक्त कीं।
प्रचार-प्रसार संयोजक: रोमिल पाटणी, सोनकच्छ; नरेंद्र अजमेरा एवं पियुष कासलीवाल, औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी।
संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312






