जीभ से नहीं, आचरण से बोलता है दिगंबर संत का जीवन : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी

धर्म

जीभ से नहीं, आचरण से बोलता है दिगंबर संत का जीवन : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी

 

पुष्पगिरी तीर्थ की धर्मसभा में गूंजे आत्मचिंतन के स्वर—बोले आचार्य, भौतिकता की चकाचौंध में दिगंबर संत बनना ‘बिना दांत के चना चबाने’ जैसा कठिन

 

पुष्पगिरी तीर्थ, सोनकच्छ।

“जीभ से बोले गए शब्दों का सफर केवल कानों तक होता है, लेकिन आचरण और जीवन के मौन शब्दों की यात्रा व्यक्ति के जीवन को ही तीर्थ बना देती है।”

 

पुष्पगिरी तीर्थ में आयोजित धर्मसभा में व्रत चक्रवर्ती पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने गुरुभक्तों को संबोधित करते हुए यह प्रेरक संदेश दिया। आचार्य श्री के विचारों ने श्रद्धालुओं को बाहरी दिखावे से ऊपर उठकर अपने आचरण, संयम और आत्मशुद्धि की ओर बढ़ने की प्रेरणा दी।

 

महावीर के मार्ग पर केवल छोड़ना है, ओढ़ना नहीं

 

आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने दिगंबरत्व की महिमा समझाते हुए कहा कि दिगंबर जैन संत अपने उपदेशों से कम और अपने तप, त्याग, संयम एवं विशुद्ध आचरण से अधिक बोलते हैं। उनके जीवन का प्रत्येक क्षण समाज के लिए एक संदेश और प्रेरणा बन जाता है।

 

उन्होंने कहा कि आज की भौतिकता, आकर्षण और चकाचौंध से भरी दुनिया में दिगंबर संत बनना अत्यंत कठिन साधना है। यह “बिना दांत के चना चबाने” अथवा “तकिए से कील ठोकने” जैसा कठिन कार्य है।

 

आचार्य श्री ने स्पष्ट किया कि दिगंबरत्व केवल बाहरी स्वरूप या वस्त्रों के त्याग का नाम नहीं है, बल्कि यह आत्मा की शुद्ध, सहज और निर्विकार अवस्था की साधना है।

 

उन्होंने कहा कि सामान्यतः दुनिया में संन्यास का अर्थ एक वेश छोड़कर दूसरा वेश धारण करना माना जाता है, लेकिन भगवान महावीर के मार्ग पर चलने वाले दिगंबर मुनि के लिए संन्यास का अर्थ है—“केवल छोड़ना ही छोड़ना है, ओढ़ना कुछ भी नहीं।”

 

वस्त्र छोड़ना आसान, भीतर के विकार छोड़ना कठिन

 

आचार्य श्री ने कहा कि त्याग करते-करते जब आत्मा की सहज एवं प्राकृतिक स्थिति प्रकट होती है, वही वास्तविक दिगंबरत्व है। बाहरी वस्त्रों का त्याग अपेक्षाकृत सरल हो सकता है, लेकिन मन के भीतर जड़ जमाए बैठे विकारों, वासनाओं, इच्छाओं और आसक्तियों का त्याग करना सबसे कठिन साधना है।

 

उन्होंने कहा, “प्रकृति ने हमें जिस प्राकृतिक रूप में भेजा है, उसी में निर्विकारी भाव से जीवन जीना मुनि धर्म की साधना है। वस्त्रों का त्याग केवल बाहरी परिवर्तन है, जबकि भीतर के विकारों पर विजय प्राप्त करना वास्तविक साधना है।”

 

आचार्य श्री ने कहा कि जो व्यक्ति अपने भीतर के विकारों और वासनाओं पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही सच्चे अर्थों में भगवान महावीर के मार्ग पर आगे बढ़ता है।

 

धर्मसभा में बना भक्तिमय वातावरण

 

आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज के प्रेरक उद्बोधन से धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालु आत्मचिंतन और संयम की भावना से ओतप्रोत नजर आए। पूरे कार्यक्रम के दौरान भक्तिमय वातावरण बना रहा और श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री के संदेश को जीवन में उतारने का संकल्प लिया।

 

प्रचार-प्रसार संयोजक : नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल

औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी के आधार पर संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

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