रक्षाबंधन पर बहन ने भाई को दिया जिंदगी का अनमोल तोहफा, लिवर का हिस्सा देकर बचाई जान
भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र ही नहीं, बहन ने अपने शरीर का हिस्सा देकर निभाया जीवनभर की रक्षा का वचन
खरगोन।
रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और रक्षा के संकल्प का प्रतीक है। आमतौर पर इस दिन बहन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उसकी लंबी उम्र और सुखी जीवन की कामना करती है। लेकिन मध्य प्रदेश के खरगोन जिले की सेंधवा तहसील के भीकनगांव निवासी 47 वर्षीय नेहा मनीष अग्रवाल ने इस रिश्ते की ऐसी मिसाल कायम की है, जिसकी चर्चा पूरे प्रदेश में हो रही है।
नेहा ने अपने भाई 55 वर्षीय सुशील कुमार मांगीलाल अग्रवाल की जिंदगी बचाने के लिए अपने लिवर का एक हिस्सा दान कर दिया। बहन के इस त्याग ने न केवल भाई को नया जीवन दिया, बल्कि रक्षाबंधन के पवित्र रिश्ते को एक ऐसी भावनात्मक मिसाल में बदल दिया, जिसे लंबे समय तक याद किया जाएगा।
गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे सुशील
सुशील लंबे समय से गंभीर लिवर बीमारी से जूझ रहे थे। चिकित्सकों ने उनके उपचार के लिए लिवर प्रत्यारोपण को ही जीवन बचाने का प्रमुख विकल्प बताया था। ऐसे कठिन समय में पूरा परिवार चिंता और असमंजस में था।
भाई की जिंदगी बचाने की बात सामने आई तो बहन नेहा बिना किसी संकोच के आगे आईं। उन्होंने अपने लिवर का एक हिस्सा भाई को देने का निर्णय लिया। नेहा के इस साहसिक फैसले ने परिवार में उम्मीद की नई किरण जगा दी।
करीब 12 घंटे चली जटिल शल्य चिकित्सा
18 अप्रैल 2026 को गुरुग्राम स्थित मेदांता अस्पताल में प्रसिद्ध लिवर विशेषज्ञ डॉ. अरविंदर सिंह सोइन के नेतृत्व में लिवर प्रत्यारोपण किया गया। करीब 12 घंटे चली जटिल शल्य चिकित्सा में नेहा की दाता संबंधी शल्य चिकित्सा लगभग सात घंटे तक चली।
अत्याधुनिक रोबोटिक तकनीक की सहायता से नेहा के लिवर का एक हिस्सा निकालकर सुशील के शरीर में प्रत्यारोपित किया गया। सफल प्रत्यारोपण के बाद परिवार की चिंता धीरे-धीरे खुशी में बदल गई।
परिवार ने दिया नेहा का पूरा साथ
नेहा के इस साहसिक निर्णय में उनके पति मनीष अग्रवाल और बच्चों शुभद्रा, अनुश्री, रिद्धि और निकुंज ने पूरा साथ दिया। वहीं सुशील की पत्नी अनीता, बेटी पलक और बेटे अक्षत के लिए नेहा का यह त्याग किसी वरदान से कम नहीं रहा।
रक्षाबंधन पर नेहा ने साबित कर दिया कि भाई की कलाई पर बंधा रक्षा सूत्र ही बहन के प्रेम और रक्षा का प्रतीक नहीं है। जब भाई की जिंदगी पर संकट आया तो बहन ने अपना जिगर का हिस्सा देकर उसके जीवन की डोर थाम ली।
यह सिर्फ एक बहन द्वारा भाई को दिया गया उपहार नहीं, बल्कि रिश्तों की उस गहराई की कहानी है, जहां प्रेम शब्दों से नहीं, त्याग से दिखाई देता है।
