“संसार से डरकर मत जियो, डटकर जियो : मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज”
-भागना पलायन है, भोगना बेबसी और जागना जीवन की वास्तविक चेतना
गिरीडीह (मधुवन)
“संसार में डरकर मत जियो, संसार के बंधनों से सजग रहो। भागना पलायन है,तो भोगना बेबसी है, और जागना जीवन की वास्तविक चेतना है”
“कर्मों को केवल भोगना नहीं है, उन्हें काटने का पुरुषार्थ करना है,डरो मत, डटकर जियो।”
उपरोक्त उद्गार राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने गुणायतन में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज मुनि श्री संधान सागर महाराज का गुणायतन में संघ सहित चातुर्मास चल रहा है। उनके सान्निध्य में श्रद्धालुओं को निरंतर आत्मजागृति, वैराग्य और जीवन-प्रबंधन का मार्गदर्शन प्राप्त हो रहा है। प्रतिदिन प्रातः 8: बजे से अभिषेक एवं शांतिधारा त्पश्चात मंगल प्रवचन, दोपहर 3:30 बजे से स्वाध्याय तथा सायंकाल 6 बजे से शंका समाधान का कार्यक्रम संपन्न हो रहा है।मुनिश्री ने सम्वोधित करते हुये कहा कि जिस संसार में हम जीवन जी रहे हैं,वहां सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय तथा संयोग-वियोग जैसी अनेक परिस्थितियां निरंतर आती-जाती रहती हैं।संसार का स्वरूप परिवर्तनशील और दुःखमय है, इसलिए उसके वास्तविक स्वरूप को समझकर व्यक्ति के भीतर जागरूकता और वैराग्य का भाव उत्पन्न होना चाहिए।उन्होंने कहा कि संसार से भागना समाधान नहीं है।यदि व्यक्ति बाहरी संसार से दूर भी चला जाए,तब भी जब तक उसके भीतर संसार बसा है, तब तक दुःख से मुक्ति संभव नहीं है। सुखी रहने का सूत्र बताते हुए मुनिश्री ने कहा—“तुम संसार में रहो, तुममें संसार न रहे।” संसार में रहना और अपने भीतर संसार को बसाए रखना, दोनों में बहुत बड़ा अंतर है।संसार में नहीं, संसार के बंधनों से डरें मुनि श्री ने सोलह कारण भावनाओं की पांचवीं भावना अभिक्षण संवेग की चर्चा करते हुए कहा कि केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है। ज्ञान के साथ वैराग्य भी आवश्यक है। संसार से बचने, उसके बंधनों से सजग रहने और उसके वास्तविक स्वरूप के प्रति निरंतर चेतन रहने का नाम ही संवेग है।
उन्होंने कहा, “संसार में डरना और संसार से डरना दोनों अलग बातें हैं। संसार में डरकर मत रहो, लेकिन संसार के बंधनों से हमेशा सजग रहो।”मुनिश्री ने कहा कि भय व्यक्ति के भीतर की दुर्बलता है।भय आत्मविश्वास को कमजोर करता है और जीवन की प्रगति को अवरुद्ध करता है। सुख-दुःख, लाभ-हानि,जय-पराजय और संयोग-वियोग बाहरी परिस्थितियां हैं। इनके परिवर्तन से आत्मा के वास्तविक स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं आता। इसलिए व्यक्ति को परिस्थितियों से भयभीत होकर नहीं, बल्कि आत्मविश्वास के साथ डटकर जीना चाहिए। राष्ट्रसंत ने जीवन के चार महत्वपूर्ण पक्षों—भागना, भोगना, जागना और त्यागना—की चर्चा करते हुए कहा कि कठिन परिस्थितियों से भागना सबसे सरल दिखाई देता है, लेकिन भागकर व्यक्ति आखिर जाएगा कहाँ? जीवन में निर्मित होने वाली अनेक परिस्थितियां हमारे अपने कर्मों और प्रवृत्तियों का परिणाम होती हैं।
उन्होंने कहा कि स्थान और बाहरी परिस्थितियां बदल सकती हैं, लेकिन कर्म व्यक्ति का पीछा नहीं छोड़ते। वे परछाईं की तरह उसके साथ चलते हैं। मुनिश्री ने कहा, “भागने से जीवन कभी नहीं बदल सकता। समस्याओं और कठिनाइयों का सामना करोगे तो आगे बढ़ोगे, लेकिन उनसे भागोगे तो वे और गहरी होती जाएंगी।”परिस्थिति के ‘बंदर’ से भागिए मत, सामना कीजिए अपने ब्रह्मचर्य जीवन का एक प्रसंग सुनाते हुए मुनिश्री ने बताया कि खुरई प्रवास के दौरान एक दिन वे छत पर सूख रही अपनी धोती उठाने गए। तभी एक बड़ा बंदर उन्हें देखकर भभकी देने लगा। वे भयवश पीछे हटने और भागने लगे।
तभी वहां मौजूद माली ने दूर से आवाज दी—“त्यागी जी, भागिए मत।” मुनिश्री रुक गए। जैसे ही बंदर ने माली को हाथ में लाठी लिए देखा, वह स्वयं भाग गया। बाद में माली ने कहा—“इन बंदरों से भागोगे तो हमला करेंगे और सामना करोगे तो भाग जाएंगे।”राष्ट्रसंत ने कहा कि यह बात उनके मन में गहराई से बैठ गई। जीवन में जब भी परिस्थितियों का कोई ‘बंदर’ भभकी दे, उससे भागना नहीं चाहिए, बल्कि जागरूक होकर उसका सामना करना चाहिए।
न पलायन, न बेबसी—जागना है जरूरी मुनिश्री ने कहा कि केवल भागना ही गलत नहीं है, परिस्थितियों के सामने लाचार होकर उन्हें भोगते रहना भी उचित नहीं है। भोगने का अर्थ है परिस्थितियों के आगे आत्मसमर्पण कर देना और बेबस जीवन जीना।उन्होंने कहा कि जीवन में न तो पलायन अच्छा है और न ही बेबसी। दोनों व्यक्ति को भीतर से तोड़ते हैं। यदि परिस्थितियों को बदला जा सकता है तो उन्हें बदलने का यथासंभव प्रयास करना चाहिए और यदि तत्काल परिवर्तन संभव नहीं है तो उनके प्रति जागना चाहिए।
मुनिश्री ने कहा कि जागने का अर्थ है—परिस्थिति के कारणों को समझना, उससे होने वाले नुकसान को कम करना और उसके समाधान के लिए निरंतर प्रयास करना।सुप्त आत्मा कर्म भोगती है, जागृत आत्मा कर्म काटती है मुनि श्री ने कहा कि जीवन में आने वाली परेशानियों और कष्टों के लिए केवल बाहरी निमित्तों को दोषी नहीं ठहराना चाहिए। जिन लोगों या परिस्थितियों के प्रति हम उंगली उठाते हैं, वे केवल बाहरी निमित्त हैं। इन परिस्थितियों की वास्तविक जड़ हमारे अपने कर्म हैं। उन्होंने कहा कि कर्म से भागने पर वह पीछा नहीं छोड़ता और उसे बेबसी के साथ भोगते रहने से व्यक्ति भीतर से कमजोर होता जाता है। इसलिए जागृत जीवन का उद्देश्य कर्मों को केवल भोगना नहीं, बल्कि उन्हें काटने का पुरुषार्थ करना होना चाहिए। मुनिश्री ने कहा, “एक जागृत आत्मा और एक सुप्त आत्मा में इतना ही अंतर है कि सुप्त आत्मा कर्म को भोगती है और जागृत आत्मा कर्म को काटती है।”उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि विपरीत परिस्थितियों में रोते हुए, व्याकुल और असहाय होकर जीवन बिताना कर्म को भोगना है, जबकि परिस्थितियों के कारणों को समझकर आत्मबल और पुरुषार्थ के साथ उनका सामना करना कर्मों को काटने की दिशा में आगे बढ़ना है।
राष्ट्रसंत ने कहा कि जीवन की सच्ची सफलता कठिनाइयों से पलायन करने में नहीं, बल्कि जागरूक होकर उनका सामना करने में है। संसार में रहते हुए भी संसार के बंधनों से मुक्त रहने का प्रयास करें और भयभीत होकर नहीं, बल्कि आत्मविश्वास के साथ जीवन जिएं!
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312





