आंखों की असली कीमत तब समझ आती है जब रोशनी छिन जाती है, असीम इच्छाओं का त्याग ही व्रती का धर्म: सुधासागर महाराज
इंदौर।
निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव, ज्ञानी-ध्यानी 108 श्री सुधासागर जी महाराज ने अपने प्रेरणादायी प्रवचन में कहा कि किसी भी वस्तु का वास्तविक मूल्य उसके अभाव में ही समझ आता है। इसलिए जब जीवन में सद्भाव, स्वास्थ्य, परिवार, गुरु और धर्म का सान्निध्य प्राप्त हो, तभी उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी असीम इच्छाएं हैं। उन्होंने कहा कि व्यक्ति एक वस्तु खरीदने बाजार जाता है, लेकिन दूसरी वस्तु देखकर उसकी नीयत बदल जाती है। यही मोह और माया का कारण बनता है। उन्होंने प्रेरित करते हुए कहा कि जीवन में पहले यह तय करें कि वास्तव में हमें चाहिए क्या। जो व्यक्ति अपनी असीम इच्छाओं पर नियंत्रण कर लेता है, वही सच्चा व्रती कहलाता है।
मुनिश्री ने आंखों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आंखों की कीमत वही समझ सकता है जिसने अंधकार या अंधत्व का अनुभव किया हो। यदि किसी नेत्रहीन व्यक्ति से पूछा जाए कि आंखों का मूल्य क्या है, तो वह अपनी पूरी कमाई देने को तैयार हो जाएगा, लेकिन आंखें वापस पाना चाहेगा।
उन्होंने कहा कि हमें यह विचार करना चाहिए कि ईश्वर प्रदत्त इन आंखों का हमने कितना सदुपयोग किया है। यदि हमारी दृष्टि के कारण चलते समय असंख्य छोटे-छोटे जीवों की रक्षा होती है, तो वह भी हमारे लिए पुण्य का कारण बनता है। इसलिए आंखों का उपयोग केवल संसार देखने के लिए नहीं, बल्कि जीवदया, करुणा और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए करना चाहिए।
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे अपने जीवन में इच्छाओं को सीमित करें, कृतज्ञता का भाव अपनाएं और अपने प्रत्येक संसाधन का सदुपयोग करते हुए आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर हों।
संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

