“बेटियां मुस्कुरा रही हैं तो पिता सफल हैं” — डॉ. कुमार विश्वास के पेरेंटिंग विचारों ने छू लिया हर दिल

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“बेटियां मुस्कुरा रही हैं तो पिता सफल हैं” — डॉ. कुमार विश्वास के पेरेंटिंग विचारों ने छू लिया हर दिल

 

‘बच्चों को एलआईसी नहीं, संस्कारों की पूंजी समझिए’— माता-पिता और बच्चों के रिश्तों पर कुमार विश्वास के प्रेरक विचार सोशल मीडिया पर हो रहे वायरल

 

प्रख्यात कवि और वक्ता डॉ. कुमार विश्वास अपनी ओजस्वी कविताओं के साथ-साथ पारिवारिक रिश्तों और पेरेंटिंग पर दिए गए विचारों के कारण भी लगातार चर्चा में रहते हैं। माता-पिता और बच्चों के बीच विश्वास, संस्कार और भावनात्मक जुड़ाव को लेकर उनके कई प्रेरक कथन सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। उनके विचार न केवल अभिभावकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हैं, बल्कि परिवार में प्रेम, संवाद और विश्वास का वातावरण बनाने का संदेश भी देते हैं।

सबसे चर्चित कथनों में से एक में कुमार विश्वास कहते हैं—

“अगर जानना है कि कोई पिता कितना अच्छा है, तो उसकी बेटियों को देखिए। अगर वे हंस रही हैं, आत्मविश्वास से भरी हैं, तो वह अच्छा पिता है। अगर वे डरी, संकोची और भयभीत हैं, तो कहीं न कहीं पिता की भूमिका पर सवाल उठता है।”

 

उनका मानना है कि पिता केवल पालन-पोषण करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि बेटी का पहला मित्र और सबसे बड़ा विश्वास होना चाहिए। घर का माहौल ऐसा हो, जहां बेटियां बिना किसी डर और संकोच के अपनी हर खुशी, चिंता और परेशानी अपने माता-पिता से साझा कर सकें।

 

बच्चों को एलआईसी मत समझिए’

कुमार विश्वास का एक और विचार लोगों के बीच खूब चर्चा में है। वे कहते हैं—> “अपने बच्चों को एलआईसी समझना बंद कीजिए। अगर आपने उन्हें निवेश माना है तो यह व्यापार है, लेकिन यदि आपने उन्हें संस्कार दिए हैं, तो उनके पास एक रोटी भी होगी तो पहले आपको खिलाएंगे।”

 

इस संदेश के माध्यम से वे बताते हैं कि बच्चों का पालन-पोषण भविष्य में किसी प्रतिफल की उम्मीद से नहीं, बल्कि प्रेम, जिम्मेदारी और अच्छे संस्कार देने के उद्देश्य से होना चाहिए। सच्चे संस्कार ही बच्चों को जीवनभर माता-पिता के प्रति सम्मान और समर्पण का भाव सिखाते हैं।

बेटियों की भावनाएं सुनना भी है माता-पिता का दायित्व

कुमार विश्वास का एक और भावुक संदेश माता-पिता को संवेदनशील बनने की सीख देता है। वे कहते हैं—> “जिन मां-बाप ने अपनी बेटियों को गले लगाकर उनके सुख-दुख नहीं सुने, वे परदेस में कंधा तलाशती हैं।”यह विचार इस बात पर जोर देता है कि बच्चों को केवल सुविधाएं देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें भावनात्मक सुरक्षा, अपनापन और संवाद का अवसर भी मिलना चाहिए। यदि बच्चे घर में अपनी बात खुलकर नहीं कह पाएंगे, तो वे अपनी भावनाएं बाहर किसी और के साथ साझा करने लगेंगे।

 

 

संवाद ही मजबूत रिश्तों की नींव

विशेषज्ञों का भी मानना है कि बच्चों की परवरिश में संवाद, विश्वास और सम्मान सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं। जब माता-पिता बच्चों की भावनाओं को समझते हैं, बिना डांट-फटकार के उनकी बातें सुनते हैं और हर परिस्थिति में उनका साथ देते हैं, तब परिवार के रिश्ते मजबूत बनते हैं।डॉ. कुमार विश्वास के ये विचार आज के दौर में अभिभावकों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश हैं कि बच्चों को संपत्ति नहीं, बल्कि संस्कारों और विश्वास की सबसे बड़ी जिम्मेदारी समझें। प्रेम, संवाद और अपनापन ही वह पूंजी है, जो परिवार को जीवनभर जोड़े रखती है।

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