खुद को खोजो, परमात्मा स्वयं मिल जाएंगे; आत्मचिंतन ही जीवन का वास्तविक लक्ष्य — आचार्य श्री सुनीलसागर जी महाराज
इंद्रपुरी चातुर्मास महोत्सव में उमड़ा श्रद्धा का सागर, आचार्यश्री ने दिए जीवन को सार्थक बनाने वाले चार अमूल्य सूत्र
इंदौर, 27 जुलाई।
इंद्रपुरी चातुर्मास उत्सव (ICU) के अंतर्गत नेमिनगर जैन कॉलोनी में सोमवार को आयोजित धर्मसभा आध्यात्मिक ऊर्जा, श्रद्धा और आत्मचिंतन का अनुपम संगम बन गई। राष्ट्र गौरव, चतुर्थ पट्टाधीश आचार्य भगवंत 108 श्री सुनीलसागर जी महाराज के ओजस्वी एवं प्रेरणादायी प्रवचनों ने उपस्थित श्रद्धालुओं को आत्मजागरण और जीवन के वास्तविक उद्देश्य का संदेश दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मंगलाचरण एवं चित्रानावरण के साथ हुआ। इसके पश्चात आचार्यश्री का पाद प्रक्षालन एवं जिनवाणी भेंट का पुण्य अवसर संपन्न हुआ। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर गुरुवाणी का लाभ प्राप्त किया।

अपने प्रवचन में आचार्यश्री ने भावपूर्ण शब्दों में कहा—
“वो ज़मीन न मिली, वो आसमान न मिला,
जिसको जहाँ ढूँढ़ा, वो वहाँ न मिला।
क्यों हम इस दुनिया में परेशान हैं?
क्योंकि न खुद को ढूँढ़ा, न खुदा ही मिला।”
उन्होंने कहा कि मनुष्य संसार में सुख और शांति की खोज बाहरी वस्तुओं एवं व्यक्तियों में करता है, जबकि वास्तविक आनंद और परमात्मा का अनुभव अपने ही अंतर्मन में छिपा है। जो स्वयं को पहचान लेता है, उसके लिए परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाता है।

आचार्यश्री ने कहा कि जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य किसी न किसी के सहारे पर रहता है— बचपन में माता-पिता की गोद, फिर परिवार, समाज और अंत में कंधों का सहारा। इसके बावजूद अहंकार मनुष्य को यह भ्रम करा देता है कि उसे किसी की आवश्यकता नहीं। उन्होंने प्रेरित किया कि यदि हम समाज का सहारा लेते हैं तो ऐसा जीवन जिएँ कि आवश्यकता पड़ने पर समाज भी हमें अपना सहारा मान सके।

उन्होंने कहा कि आज अधिकांश संबंध स्वार्थ पर आधारित दिखाई देते हैं। स्वार्थ समाप्त होते ही अपने भी पराए बन जाते हैं। ऐसे समय में देव, शास्त्र और गुरु का सान्निध्य ही मनुष्य को बुरे विचारों, तनाव और व्यर्थ के जंजाल से बचाकर सही दिशा प्रदान करता है।
धर्मसभा में आचार्यश्री ने जीवन को सफल बनाने के लिए चार अमूल्य सूत्र भी दिए—
- कभी किसी का बुरा न सोचें।
- व्यर्थ के जंजाल में न उलझें।
- व्यसनयुक्त जीवन से सदैव दूर रहें।
- परमात्मा का कभी विस्मरण न करें।
उन्होंने श्रद्धालुओं का आह्वान करते हुए कहा कि मंदिर में केवल प्रतिमा के दर्शन तक ही सीमित न रहें, बल्कि अपने भीतर विराजमान परमात्मा स्वरूप को जागृत करने का भी निरंतर प्रयास करें। यही आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की वास्तविक साधना है।
संध्याकालीन सत्र में आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया। इसके पश्चात गुरुभक्ति एवं मंगल आरती अत्यंत श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ संपन्न हुई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागी बनकर धर्मलाभ प्राप्त किया।
— जानकारी : माही जैन धीरावत, पीपलखूंट (प्रतापगढ़)
— संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

