सम्यक श्रद्धा, सम्यक ज्ञान और त्याग का समन्वय ही मोक्ष का वास्तविक मार्ग है : निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज

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सम्यक श्रद्धा, सम्यक ज्ञान और त्याग का समन्वय ही मोक्ष का वास्तविक मार्ग है : निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज
आत्मबोध और सम्यक दर्शन के बिना जीवन अधूरा, भगवान महावीर की वीतराग वाणी सत्य का शाश्वत प्रकाश : मुनि श्री

कोटा, 26 जुलाई।

श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में आयोजित श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के छठे दिवस आध्यात्मिक श्रद्धा, आत्मबोध एवं सम्यक दर्शन पर आधारित प्रेरणादायी प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को गहन आत्मचिंतन के लिए प्रेरित किया। प्रातःकाल से ही मंदिर परिसर णमोकार महामंत्र, जिनवाणी और भक्तिरस से गुंजायमान रहा। अभिषेक, शांतिधारा, पूजन, अर्घ्य समर्पण एवं सिद्धचक्र विधान में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागी होकर आत्मकल्याण तथा विश्वशांति की मंगलकामना की।

 

 

मंदिर के निदेशक हुकम जैन ‘काका’ ने बताया कि मंत्रोच्चार, पूजन-अर्चन एवं भक्तिभाव से संपूर्ण वातावरण धर्ममय एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर रहा। श्रद्धालुओं ने अत्यंत श्रद्धा और अनुशासन के साथ विधान में भाग लेकर धर्मलाभ अर्जित किया।


आत्मा पर अटूट श्रद्धा ही सम्यक दर्शन का आधार
धर्मसभा को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि श्रद्धा का आधार प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि सत्य के प्रति अटूट विश्वास होता है। मनुष्य संसार को जानने का दावा तो करता है, किंतु स्वयं अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान पाता। यही अज्ञान, भ्रम और मिथ्यात्व का मूल कारण है।
उन्होंने कहा कि दूसरों पर विश्वास करने से अधिक आवश्यक है कि मनुष्य अपने शुद्ध आत्मस्वरूप पर अडिग श्रद्धा रखे। जब आत्मा का यथार्थ बोध हो जाता है, तब समस्त पदार्थों का भी यथार्थ ज्ञान स्वतः प्रकट होने लगता है।


सम्यक दर्शन संशयरहित श्रद्धा का नाम है
मुनिश्री ने कहा कि सम्यक दर्शन का अर्थ है—निर्मल, निष्कलंक, संशयरहित और सत्यनिष्ठ श्रद्धा।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण विश्वास होता है कि जलता हुआ अंगारा हाथ पर रखने से वह अवश्य जलाएगा, उसी प्रकार आत्मा के अस्तित्व, उसकी शुद्धता और उसके अनंत गुणों पर भी अटूट विश्वास होना चाहिए।


उन्होंने कहा कि भगवान महावीर की दिव्य वाणी ने संसार को सत्य का मार्ग दिखाया, किंतु कालांतर में लोगों ने अपनी-अपनी मान्यताओं और दृष्टिकोण के अनुसार उसका अर्थ ग्रहण किया, जिससे अनेक मत-मतांतर उत्पन्न हुए। इसलिए सत्य को जानने के लिए वीतरागों की मूल वाणी और सम्यक दृष्टि का आश्रय आवश्यक है।


तीन रत्नों के समन्वय से ही प्रशस्त होता है मोक्षमार्ग
मुनिश्री ने स्पष्ट किया कि सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र—ये जैन दर्शन के तीन अमूल्य रत्न हैं और यही मोक्षमार्ग की आधारशिला हैं।

उन्होंने कहा कि यदि त्याग हो, परंतु सम्यक दर्शन न हो, तो वह मुक्ति का साधन नहीं बन सकता। इसी प्रकार ज्ञान यदि सम्यक दृष्टि से रहित हो तो वह सही दिशा नहीं दे सकता, और केवल श्रद्धा भी आचरण के बिना अधूरी है।श्रद्धा, ज्ञान और चरित्र का संतुलित समन्वय ही आत्मकल्याण, आत्मशुद्धि और मोक्ष का वास्तविक मार्ग है।

भक्ति और श्रद्धा से सम्पन्न हुआ छठे दिन का विधान
मुख्य संयोजक धर्मचंद जैन धानोप्या एवं अर्चना (रानी) सर्राफ ने बताया कि सिद्धचक्र महामंडल विधान के छठे दिवस 512 ऋद्धियों के अर्घ्य अत्यंत श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ समर्पित किए गए।
प्रातःकाल अभिषेक, शांतिधारा एवं नित्य पूजन के साथ विधान का शुभारंभ हुआ। विधानाचार्यों के निर्देशन में श्रद्धालुओं ने सिद्धचक्र महामंडल की विधिपूर्वक आराधना की। संपूर्ण मंदिर परिसर णमोकार महामंत्र, मंगलाचरण, जैन भक्ति गीतों एवं जयघोष से गुंजायमान रहा। बड़ी संख्या में महिला-पुरुष श्रद्धालुओं ने विधान में सहभागी होकर आत्मकल्याण एवं समस्त प्राणिमात्र के मंगल की कामना की।
आज के पुण्यार्जक
समिति के अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री राजेन्द्र जी, श्री हुकम जैन ‘काका’ हरसोरा परिवार, श्री महावीर जी मित्तल तथा श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार द्वारा प्राप्त किया गया।
समिति के महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्री ऋषभ जी मोहिवाल द्वारा प्राप्त किया गया तथा उन्होंने मुनिश्री का मंगल आशीर्वाद ग्रहण किया।
समिति के उपाध्यक्ष सुमित जैन एवं मनोज बगड़ा ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री पुण्योदय भक्तामर मंडल के सदस्यों द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।
प्रशासनिक मंत्री पारस दोराया ने बताया कि आज मुनिश्री के आहारदान का सौभाग्य श्री प्रकाश जी, श्री सुनील जी माडिया परिवार को प्राप्त हुआ।
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गुरुवाणी के प्रमुख संदेश
🔸 सम्यक श्रद्धा, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र का समन्वय ही मोक्ष का वास्तविक मार्ग है।
🔸 आत्मा के शुद्ध स्वरूप पर अटूट विश्वास ही सम्यक दर्शन का प्रथम चरण है।
🔸 मिथ्यात्व का कारण आत्मस्वरूप का विस्मरण है, जबकि आत्मबोध मुक्ति का द्वार खोलता है।
🔸 भगवान महावीर की वीतराग वाणी सत्य, करुणा और आत्मकल्याण का शाश्वत प्रकाश है।
🔸 श्रद्धा बिना आचरण अधूरी है, ज्ञान बिना सम्यक दृष्टि निष्प्रभावी है और त्याग बिना सम्यक दर्शन मोक्ष का साधन नहीं बन सकता।
🔸 जीवन का वास्तविक उद्देश्य आत्मा की शुद्धि, कर्मनिर्जरा और मोक्ष की प्राप्ति है।

           संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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