भगवान महावीर की वीतराग वाणी आत्मकल्याण का अचूक मार्ग, अनुभव और प्रमाण पर आधारित है जैन दर्शन : मुनि योगसागर महाराज

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भगवान महावीर की वीतराग वाणी आत्मकल्याण का अचूक मार्ग, अनुभव और प्रमाण पर आधारित है जैन दर्शन : मुनि योगसागर महाराज

सिद्धचक्र महामंडल विधान के पांचवें दिन धर्मसभा में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब, मुनिश्री बोले— सच्चा धर्म वही, जो पतित आत्मा को पावन बनाकर आत्मानुभूति तक पहुंचाए

कोटा, 25 जुलाई।
श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में आयोजित श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के पांचवें दिवस धर्म, भक्ति और आत्मचिंतन का अद्भुत संगम देखने को मिला। परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज के सान्निध्य में आयोजित धर्मसभा में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। पूरे मंदिर परिसर में णमोकार महामंत्र, जिनवाणी और भक्तिरस की गूंज के बीच श्रद्धालुओं ने अभिषेक, शांतिधारा, पूजन एवं विधान के माध्यम से आत्मकल्याण और विश्वशांति की मंगलकामना की।

 

 

मंदिर के निदेशक हुकम जैन ‘काका’ ने बताया कि विधान में समाज के सभी वर्गों—महिला मंडल, युवक-युवतियों तथा बाल संस्कार वर्ग के विद्यार्थियों ने उत्साह और श्रद्धा के साथ सहभागिता कर धर्मलाभ अर्जित किया।

‘भगवान महावीर की वीतराग वाणी आत्मोद्धार का विज्ञान है’

धर्मसभा को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि भगवान महावीर की दिव्य देशना केवल उपदेश नहीं, बल्कि अनुभवजन्य एवं प्रमाणिक आध्यात्मिक विज्ञान है। यह ऐसी वीतराग वाणी है, जिसने अनगिनत आचार्यों और साधकों को आत्मानुभूति का मार्ग दिखाया है। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर का संदेश आज भी उतना ही वैज्ञानिक, तर्कसंगत और सार्वकालिक है, जितना हजारों वर्ष पहले था।

मुनिश्री ने कहा कि धर्म का वास्तविक स्वरूप वही है, जो जीव को सुख, शांति, समता और आत्मानुभूति प्रदान करते हुए राग, द्वेष, मोह और कर्मबंधन से मुक्त होने की दिशा में अग्रसर करे।

‘धर्म का उद्देश्य आत्मा के शुद्ध स्वरूप का प्राकट्य है’

धर्म की सहज व्याख्या करते हुए मुनिश्री ने कहा कि जैसे एक ही गेहूं से अनेक प्रकार के व्यंजन बनाए जा सकते हैं, वैसे ही धर्म की अभिव्यक्तियां भले ही अलग-अलग हों, लेकिन उसका मूल उद्देश्य आत्मा के शुद्ध एवं स्वाभाविक स्वरूप का प्राकट्य ही है। धर्म वह दिव्य शक्ति है, जो पतित आत्मा को पावन बनाकर मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करती है।

आत्मा चेतन है, शरीर नहीं

जैन दर्शन के षड्द्रव्य सिद्धांत का उल्लेख करते हुए मुनिश्री ने कहा कि जीव ही चेतन, ज्ञानमय और संवेदनशील द्रव्य है, जबकि शेष पांच द्रव्य अजीव हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अजीव और निर्जीव में अंतर समझना आवश्यक है। आत्मा अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत शक्ति का भंडार है, लेकिन कर्मावरण के कारण वह अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव नहीं कर पाती।

‘जैन दर्शन का कर्म सिद्धांत विश्व को दिशा देता है’

मुनिश्री ने कहा कि भगवान महावीर की वीतराग वाणी अनुभवजन्य और प्रमाणिक है। इसका अनुसरण कर प्रत्येक आत्मा अपने कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन का कर्म सिद्धांत अत्यंत वैज्ञानिक, तर्कसंगत और व्यवहारिक है तथा विश्व के अन्य दर्शनों की अपेक्षा इसे विशिष्ट बनाता है। आत्मशुद्धि का मार्ग बाहर नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर है।

256 ऋद्धियों के अर्घ्य के साथ श्रद्धा का अनुपम वातावरण

समिति के अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ एवं महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि विधान के पांचवें दिन 256 ऋद्धियों के अर्घ्य अत्यंत श्रद्धा और भक्तिभाव से समर्पित किए गए। मुख्य संयोजक धर्मचंद जैन धानोप्या एवं अर्चना (रानी) सर्राफ ने बताया कि श्रद्धालुओं ने विधिपूर्वक अभिषेक, पूजन, अर्घ्य समर्पण और मंगल आरती में भाग लेकर धर्मलाभ अर्जित किया। संपूर्ण मंदिर परिसर जिनभक्ति, जयघोष और णमोकार महामंत्र से गुंजायमान रहा।

आज के प्रमुख पुण्यार्जक

महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री राजेन्द्र जी, श्री हुकम जैन ‘काका’ हरसोरा परिवार तथा श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार ने प्राप्त किया। दीप प्रज्वलन, श्रावक श्रेष्ठी एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्री संजय जी निर्वाण परिवार द्वारा किया गया, जबकि श्री अशोक खादी परिवार ने भक्ति कलश का पुण्यार्जन कर मुनिश्री का मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री पुण्योदय भक्तामर मंडल के सदस्यों द्वारा तथा आहारदान का सौभाग्य श्रीमती सुमित्रा कंसल परिवार को प्राप्त हुआ।

— संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

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