श्री श्रुत सागर जी समता सरलता दयालु और शीतलता गुणों के कारण सारे संसार मे पूज्य बने
आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी
छोटा महावीर जी धार
ज्येष्ट माह बहुत ही भीषण गर्मी का माह है, इस माह में श्री श्रुत सागर जी ने 12 वर्ष की नियम सल्लेखना तृतीय पट्टाधीश आचार्य श्री धर्म सागर जी से ली। तथा रेत के समुद्र लुड़वा में भीषण गर्मी में यम सल्लेखना में 8 उपवास पूर्ण कर 9 वे दिन आपकी समाधि हुई जो सभी साधुओ के लिए प्रेरणा दायी है।

यह प्रेरक उदबोधन वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी ने छोटा महावीर जी कागदीपुरा धार में समाधि दिवस पर आयोजित विधान पूजन के अवसर पर धर्म सभा मे प्रकट किये।
सभा में आगे आचार्य श्री ने आचार्य कल्प श्री श्रुत सागर जी के जीवन की अनेक महत्वपूर्ण घटनाये बताई।
मेरा सर्वनाश हो जावे
गृहस्थ अवस्था मे श्री फागुलाल जी मित्रो के साथ श्री सम्मेद शिखर जी की यात्रा पर गए सभी ने भगवान श्री पारस नाथ से भौतिक सुखों की मांग की। किंतु इन्होंने कुछ नही मांगा दोस्तो के विशेष आग्रह पर मंदिर की दीवाल पर लिख दिया कि मेरा सर्वनाश हो जावे। बहुत जिद करने पर मित्रो को इसका मतलब बताया कि इंसान 8 प्रकार के अहंकार मान कारण संसार मे भटक रहा है, इसलिए मैंने इन अहंकार के सर्वनाश की कामना की है।
चरणों मे विशिष्ट शिक्षा की प्राप्ति
आचार्य श्री ने बताया कि हमने ब्रह्मचारी अवस्था मे संघ में प्रवेश 18 वर्ष की उम्र में किया। हमे गुरुदेव से शिक्षा ज्ञान और शास्त्र ज्ञान की प्राप्ति हुई। वह वात्सल्य से हमे बेटा कहते थे। चारित्र में सुदृढ़ता कैसे प्राप्त की जावे।आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी ने शिक्षा गुरु आचार्य कल्प श्री श्रुत सागर जी का गुणानुवाद कर बताया कि, उनके जीवन मे समता सरलता दयालुता तथा शीतलता के गुणों के कारण संसार मे पूज्य बने। आपके दीक्षित शिष्यों के नाम भी मुनि श्री समता सागर जी, आर्यिका श्री सरल मति जी, आर्यिका श्री दया मति जी, एवम आर्यिका श्री शीतल मति जी ह
दितीय पट्टाधीश आचार्य श्री के अंतिम शिष्य आचार्य श्री वीर सागर जी महारा के आप अंतिम मुनि शिष्य रहे।
आचार्य पद का त्याग

आचार्य कल्प श्री श्रुत सागर जी को आचार्य पद देने का विचार ज्ञात होते ही आपने आचार्य पद का त्याग कर दिया।
विनयांजलि के पूर्व आचार्य श्री शांति सागर जी सहित सभी पूर्वाचार्यो को अर्ध समर्पित किये गए। उसके पश्चात आचार्य कल्प श्री श्रुत सागर जी की पूजन की गई। वर्तमान में आपकी एक मात्र शिष्या श्री शीतल मति जी आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी संघस्थ है।
राजेश पंचोलिया इंदौर
वात्सल्य वारिधि भक्त परिवार से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी
