27 किमी की कठिन शिखर वंदना दो चरणों में पूर्ण की: मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज ससंघ ने ससंघ ने किया सम्मेदशिखर तीर्थराज का पावन दर्शन

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27 किमी की कठिन शिखर वंदना दो चरणों में पूर्ण की: मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज ससंघ ने ससंघ ने किया सम्मेदशिखर तीर्थराज का पावन दर्शन

“सिद्धभूमि पर वंदना और ध्यान से आत्मा में पवित्रता व आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है” — मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज

 

मधुबन (गिरिडीह)।

शंका समाधान प्रणेता राष्ट्रसंत निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 प्रमाण सागर महाराज ने अपने ससंघ के साथ जैन धर्म के परम पावन तीर्थ शाश्वत तीर्थराज श्री सम्मेदशिखरजी की कठिन एवं पुण्यमयी शिखर वंदना दो चरणों में सफलतापूर्वक पूर्ण की। लगभग 27 किलोमीटर की इस कठिन पदयात्रा में साधना, तप, श्रद्धा और भक्ति का अनुपम संगम देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने भी मुनिसंघ के सानिध्य में वंदना कर आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव किया।

 

गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि शिखर वंदना का शुभारंभ 15 जुलाई को दोपहर 2:30 बजे हुआ। लगभग 9 किलोमीटर की पदयात्रा के बाद मुनिसंघ ने चोपड़ा कुंड में रात्रि विश्राम किया। अगले दिन 16 जुलाई प्रातः 5 बजे सूर्योदय के पावन बेला में भगवान पार्श्वनाथ के दर्शन, अभिषेक एवं शांतिधारा के पश्चात शिखर वंदना का दूसरा चरण प्रारंभ हुआ।

 

मुनिसंघ ने श्रद्धा एवं भक्ति के साथ सभी टोंकों की वंदना करते हुए भगवान पार्श्वनाथ की टोंक पर पहुँचकर शांतिधारा संपन्न कराई। इसके पश्चात मुनिश्री के सानिध्य में समस्त संघ एवं श्रद्धालुओं ने ध्यान-साधना की तथा मुनिश्री ने सभी को मंगलमय आशीर्वाद प्रदान किया।

 

 

इस अवसर पर मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि सिद्धभूमि पर श्रद्धापूर्वक वंदना और एकाग्रचित्त होकर ध्यान करना आत्मा की निर्मलता, अंतःकरण की पवित्रता और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करने का सर्वोत्तम माध्यम है। ऐसे सिद्धक्षेत्रों में साधना करने से मन को शांति मिलती है, कषायों का क्षय होता है तथा आत्मकल्याण की भावना सुदृढ़ होती है।

उन्होंने कहा कि श्री सम्मेदशिखरजी केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि अनंत सिद्धों की तप, त्याग और मोक्ष साधना से पावन बनी दिव्य सिद्धभूमि है। यहां श्रद्धा, विनय और समर्पण भाव से की गई वंदना एवं ध्यान साधक के भीतर वैराग्य, संयम और आत्मचिंतन के संस्कार जागृत करते हैं तथा मोक्षमार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा प्रदान करते हैं।

 

इस पुण्यमयी यात्रा में मुनिश्री संधान सागर, मुनिश्री सार सागर, मुनिश्री समादर सागर एवं मुनिश्री रूप सागर महाराज सहित अनेक श्रद्धालुओं ने भी पैदल शिखर वंदना कर धर्मलाभ प्राप्त किया।

 

जैन परंपरा में श्री सम्मेदशिखर तीर्थराज की वंदना का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना गया है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु श्रद्धा और समर्पण भाव से एक बार भी इस सिद्धभूमि की वंदना करता है, उसके आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है तथा वह धर्म, संयम और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा प्राप्त करता है।

 

(जानकारी स्रोत: गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ | संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी)9929747312

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