रिश्तों में प्रेम, संवाद और आत्मीयता लौटाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता : अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज

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रिश्तों में प्रेम, संवाद और आत्मीयता लौटाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता : अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज

 

बदलती जीवनशैली ने रिश्तों की मिठास और भारतीय संस्कृति के मूल्यों को किया प्रभावित
शाजापुर (मध्यप्रदेश)।
परम पूज्य अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज ने मकसी पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर से विहार के दौरान मार्ग में उपस्थित श्रद्धालुओं को धर्म, संस्कृति एवं मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत प्रेरणादायी संदेश दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में अपने और अपनों के बीच रिश्तों का संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

 

अपने मंगल प्रवचन में आचार्य श्री ने कहा कि भारतीय संस्कृति की आत्मा कुशलक्षेम पूछने, आत्मीय व्यवहार और अतिथि सत्कार की परंपरा में निहित रही है। पहले किसी से मिलते ही सहज भाव से उसकी कुशलक्षेम पूछी जाती थी। यह केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि संस्कारों और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति होती थी। आज वही परंपरा धीरे-धीरे औपचारिकता तक सीमित होती जा रही है।
उन्होंने कहा कि आज लोग एक-दूसरे से “कैसे हो?” तो पूछते हैं, लेकिन न पूछने वाले में वास्तविक जानने की इच्छा होती है और न ही बताने वाला अपने मन की पीड़ा खुलकर व्यक्त कर पाता है। यदि कोई अपनी सच्ची व्यथा बताने लगे तो लोग कुशलक्षेम पूछना ही छोड़ दें। यह बदलती संवेदनाओं का स्पष्ट संकेत है।

आचार्य श्री ने भारतीय संस्कृति में अतिथि सत्कार की गौरवशाली परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले घर आए अतिथि को देवतुल्य मानकर प्रेमपूर्वक भोजन कराया जाता था और उसके बाद स्वयं भोजन ग्रहण किया जाता था। आज समय इतना बदल गया है कि कई बार अतिथि के आगमन पर मन में यह विचार आने लगता है कि “ये चले जाएँ, तब हम भोजन करें।” यह परिवर्तन सामाजिक मूल्यों के क्षरण का संकेत है।

 

उन्होंने कहा कि आज परिवारों में भी आत्मीयता का अभाव दिखाई देने लगा है। अपने ही परिवार के सदस्य अब मेहमान की तरह मिलने आने लगे हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने भावपूर्ण शब्दों में कहा— “रस ही कहाँ रिश्तों में।”
श्रद्धालुओं को जीवन का सरल मार्ग बताते हुए आचार्य श्री ने कहा— “अपने दर्द को अपने रब से बोल दिया करो… फिर दर्द जाने, दवा जाने और खुदा जाने।”
उन्होंने सभी से आह्वान किया कि रिश्तों में प्रेम, संवाद, विश्वास, त्याग और आत्मीयता को पुनः स्थापित करें। यही भारतीय संस्कृति की वास्तविक पहचान है और यही मूल्य परिवार, समाज तथा राष्ट्र को सुदृढ़ बना सकते हैं।

 

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प्राप्त जानकारी: नरेंद्र अजमेरा, पीयूष कासलीवाल (औरंगाबाद)
संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

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