गुरु वही श्रेष्ठ है, जिसके प्रति समर्पण, श्रद्धा का भाव स्वतः जागृत होः मुनिश्री सुधासागर महाराज
गुना
शहर के बीजी रोड स्थित नसिया जी में आयोजित मांगलिक प्रवचन के दौरान मुनि पुंगव 108 सुधासागर महाराज ने श्रद्धालुओं को गुरु भक्ति, आत्मसमर्पण, निस्वार्थ साधना और सकारात्मक जीवन दृष्टि का संदेश दिया। प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और धर्म लाभअर्जित किया।
मुनिश्री ने कहा कि गुरु के समक्ष शिष्य के मुख से कभी ‘ना’ नहीं निकलना चाहिए, बल्कि सदैव ‘जी’ अर्थात समर्पण और आज्ञापालन का भाव होना चाहिए। जो व्यक्ति गुरु की आज्ञा का सहर्ष पालन करता है, उसके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। उन्होंने कहा कि शिष्य को अपने गुरु और रोगी को अपने चिकित्सक से कभी भी अपनी कमियां या समस्याएं नहीं छिपानी चाहिए। गुरु वही वही श्रेष्ठ है, जिसके प्रति समर्पण और श्रद्धा का भाव स्वतः जागृत हो जाए। 
प्रवचन के दौरान मुनिश्री ने कहा कि वर्तमान समय में अधिकांश लोग भगवान की भक्ति भी किसी न किसी
स्वार्थ के साथ करते हैं। यदि उन्हें अपनी इच्छा पूरी होती नहीं दिखती तो वे भगवान से भी विमुख हो जाते हैं। जबकि सच्चा भक्त कभी भी किसी सांसारिक लाभ की अपेक्षा लेकर मंदिर नहीं जाता। उन्होंने रावण का उदाहरण देते हुए कहा कि पाप की चाहत में उसने अपनी स्वर्णमयी लंका तक गंवा दी। यदि मनुष्य पाप के लिए इतना बड़ा जोखिम उठा सकता है तो धर्म और सदाचार के लिए अपना जीवन क्यों नहीं समर्पित कर सकता।
उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से मंदिर निर्माण और धार्मिक कार्यों में योगदान देने का आह्वान करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में कम से कम एक ईंट का योगदान अवश्य करना चाहिए। इससे धर्म की सेवा के साथ-साथ पुण्य की प्राप्ति भी होती है। महाभारत का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि युधिष्ठिर को संसार में कोई दुर्जन नहीं मिला, जबकि दुर्योधन को कोई सज्जन नहीं दिखाई दिया। यह अंतर केवल सोच का है। इसलिए व्यक्ति को सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और भविष्य की अनावश्यक चिंता छोड़कर वर्तमान को सार्थक बनाना चाहिए।

निस्वार्थ भक्ति ही पहचान
मुनि पुंगव सुधासागर महाराज ने कहा कि भगवान के समक्ष वही व्यक्ति सच्चा भक्त कहलाता है, जिसकी भक्ति निस्वार्थ होती है। केवल सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए की गई आराधना स्थायी सुख नहीं दे सकती। सम्यक दृष्टि वाला श्रद्धालु भगवान के चरणों में केवल आत्मकल्याण और आध्यात्मिक उन्नति की भावना लेकर जाता है। उन्होंने कहा कि भक्ति का उद्देश्य मन की शुद्धि और आत्मा का उत्थान होना चाहिए। जब व्यक्ति स्वार्थ से ऊपर उठकर धर्म को अपनाता है तभी उसके जीवन में वास्तविक शांति और संतोष का अनुभव होता है।

बदल सकती है जीवन दिशा
प्रवचन में मुनिश्री ने महाभारत के पात्रों का उदाहरण देकर सकारात्मक सोच का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि युधिष्ठिर को हर व्यक्ति में अच्छाई दिखाई देती थी, जबकि दुर्योधन को हर जगह बुराई ही नजर आती थी। यह अंतर व्यक्ति की सोच और दृष्टिकोण का परिणाम है। उन्होंने कहा कि आज का मनुष्य भविष्य की चिंता में वर्तमान को खो रहा है।

यदि व्यक्ति अपने विचारों को सकारात्मक बनाए, धर्म और संयम को जीवन में उतारे तथा वर्तमान को बेहतर बनाने का प्रयास करे, तो उसका जीवन अधिक संतुलित, सुखी औरस्वार्थ से ऊपर उठकर धर्म को अपनाता है, तभी उसके जीवन में वास्तविक शांति और संतोष का अनुभव होता है।
सकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
