त्रयी वैयावृत्ति धारी आचार्य श्री विद्यासागर महाराज 

आचार्य श्री विद्यासाग़र महाराज

त्रयी वैयावृत्ति धारी आचार्य श्री विद्यासागर महाराज 

_________________8जून, 2002, श्री सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र नेमावर, देवास, म.प्र. का प्रसंग है। संघस्थ मुनिश्री108 कुंथुसागरजी महाराज को पैर में हरपीज रोग हो गया। जिसमें वेदना अकथ होती है। 8जून को सायं पाँच बजे जब वेदना असह्य हो गई, तब उनकी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे।और आँखों को बंद किए हुए वह जोर-जोर से कुछ-कुछ बोलने लगे। ऐसी हालत देख संघस्थ एक अन्य साधु ने आचार्यश्रीजी को इसकी सूचना दी। आचार्यश्रीजी तत्काल ही उठकर मुनि श्री कुंथुसागरजी महाराज के पास पहुंच गए। और जिस पाटे पर महाराजश्री जी लेटे थे, उसी पर बैठ कर उनके पैर दबाने लगे। पास खड़े मुनि महाराजों ने ज्यों ही मना करना चाहा एवं स्वयं पैर दबाने की भावना व्यक्त की तो आचार्य श्रीजी ने सबको चुप कर दिया। पैर दबाने के एहसास से मुनि श्री कुंथुसागरजी ने पूछा- ‘कौन?’ आचार्यश्रीजी बोले- ‘हाँ, कुंथुसागर बोलो, क्या बोल रहे हो? 

 

 

आचार्यश्रीजी की आवाज सुनकर मुनिश्रीजी ने अपनी आँखें खोलीं, देखा सामने पैरों के पास गुरुवर बैठे हैं। वे एकदम हड़-बड़ाकर उठ कर बैठ गए और बोले- ‘आचार्य श्रीजी आप…आप! हमें पाप में न डालें।’ आचार्यश्रीजी बोले- ‘कभी-कभी मुझे भी तो वैयावृत्ति का लाभ ले लेने दिया करो।’ मुनिश्रीजी ने आचार्यश्रीजी के चरण छुए।

 

 

आचार्यश्रीजी बोले- ‘क्यों, कुंथुसागर अभी क्या बोल रहे थे ?’ मुनिश्रीजी बोले- ‘आत्मा अलग है, शरीर अलग है। दर्द शरीर को हो रहा है, आत्मा को नहीं।’ आचार्यश्रीजी ने कहा- ‘तो ये आँसू किसको आ रहे हैं?’ उन्होंने कहा- ‘यह भी पुद्गल है, सुख-दुःख आदि सब पुद्गल के उपकार है।’ तब आचार्यश्रीजी बोले- ‘बहुत अच्छा, ऐसा ही तत्त्वज्ञान बनाए रखो। यही समता, औषधि का काम करेगी।’ मुनिश्रीजी ने अपने दोनों हाथ जोड़कर कहा- ‘जी, आचार्यश्रीजी।धन्य है! ऐसे आचार्य गुरुवर, जो सभी शिष्यों पर अपना वात्सल्य भाव लुटाते रहते हैं।

मोक्षमार्ग में कठिनाइयों के समय न केवल उत्साहवर्धन करते हैं, अपितु मानसिक, वाचनिक एवं शारीरिक सभी प्रकार की वैयावृत्ति कर उन्हें मोक्षमार्ग में स्थिर रखते हैं। 

संकलित

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