जनहित के मुद्दे उठाने पर पत्रकार को मिली हवालात शिकायतों के बाद आनन-फानन में दर्ज हुआ राजकार्य में बाधा का मुकदमा । रामगंजमंडी

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.जनहित के मुद्दे उठाने पर पत्रकार को मिली हवालात शिकायतों के बाद आनन-फानन में दर्ज हुआ राजकार्य में बाधा का मुकदमा ।
रामगंजमंडी।
भ्रष्टाचार और प्रशासनिक मनमानी के खिलाफ आवाज उठाने वाले चौथे स्तंभ को दबाने का एक और कथित मामला सामने आया है। स्थानीय पत्रकार एवं पूर्व पार्षद राजू राठौर की पुलिस द्वारा की गई अचानक गिरफ्तारी ने पूरे क्षेत्र के प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी है। क्षेत्र में चर्चा है कि जनहित के गंभीर मुद्दों पर तीखे सवाल दागने और लिखित शिकायतें देने का श्इनामश राठौर को राजकार्य में बाधा के मुकदमे के रूप में मिला है।

मलाईदारों को सरंक्षण, सवाल उठाने वाले पर एक्शन!

पूरा मामला नगरपालिका की कार्यप्रणाली पर उठ रहे गंभीर सवालों से जुड़ा है। पत्रकार राजू राठौर ने हाल ही में सीधे प्रशासन की दुखती नस पर हाथ रख दिया था।

8 जून की शिकायत में राठौर ने नगरपालिका प्रशासक और अधिशासी अधिकारी (EO) को ई मेल द्वारा थाना चौराहे से सुकेत रोड नाके तक मुख्य वर्षा जल निकासी नाले की सफाई में बड़े पैमाने पर भेदभाव का आरोप लगाया था। शिकायत में साफ कहा गया था कि रसूखदारों और प्रभावशाली लोगों के अतिक्रमणों को बचाने के लिए अपूर्ण सफाई की गई। उन्होंने नाले के निर्माण व सफाई की तकनीकी जांच और भुगतानों पर रोक लगाने की मांग की थी।

 

6 जून की शिकायत :
इससे पहले उन्होंने बिना किसी अनुमति और NOC के नगरपालिका की करोड़ों की नव-निर्मित मुख्य सड़कों को पेयजल लाइन के नाम पर बेदर्दी से खोदने वाले संवेदक (ठेकेदार) के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी।

शिकायत पर जांच नहीं, और गिरफ्तारी ?

हैरानी की बात यह है कि नगरपालिका प्रशासन ने इन दोनों ही गंभीर और वित्तीय नुकसान से जुड़ी शिकायतों पर कोई जांच या कार्रवाई करना मुनासिब नहीं समझा। लेकिन जैसे ही ये शिकायतें व्यवस्था पर
भारी पड़ने लगीं, कथित तौर पर बदले की भावना से काम करते हुए नगरपालिका की ओर से राठौर के खिलाफ ‘राजकार्य में बाधा’ का घिसा-पिटा फॉर्मूला अपनाकर मुकदमा ठोक दिया गया। आरोप है कि पुलिस उन्हें आनन-फानन में घर से उठाकर ले गई।

प्रशासन की ‘रहस्यमयी’ चुप्पी, जनता में आक्रोश
इस पूरी दमनकारी कार्रवाई को लेकर शहर के प्रबुद्ध नागरिकों और मीडिया जगत में तीखा रोष है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या अब जनप्रतिनिधियों और पत्रकारों द्वारा जनता के पैसों की बर्बादी पर सवाल उठाना भी ‘राजकार्य में बाधा’ माना जाएगा?

इस पूरे घटनाक्रम पर जहां एक ओर जनता में तीखी प्रतिक्रियाएं हैं, वहीं दूसरी ओर हमेशा की तरह प्रशासन इस गंभीर मुद्दे पर एक विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण देने से बच रहा है। मामले की निष्पक्ष जांच की मांग अब जोर पकड़ने लगी है।

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