प्रतिभास्थली संस्कार, शिक्षा और चरित्र निर्माण की अद्वितीय प्रयोगशाला : मुनि श्री उद्यम सागर
विदिशा।
स्टेशन जैन मंदिर में आयोजित श्री 1008 श्री शांतिनाथ महामंडल विधान के अवसर पर प्रवचन देते हुए मुनि श्री उद्यम सागर महाराज ने प्रतिभास्थली की दूरदर्शी परिकल्पना और उसके माध्यम से बालिकाओं में संस्कार, शिक्षा एवं अनुशासन के विकास पर विस्तार से प्रकाश डाला।

मुनिश्री ने कहा कि “प्रतिभास्थली” पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की गहन चिंतन, दूरदृष्टि और समाज निर्माण की भावना का परिणाम है। गुरुदेव कोई भी कार्य जल्दबाजी में नहीं करते थे, बल्कि व्यापक विचार-विमर्श और गंभीर मनन के बाद ही उसे मूर्त रूप देते थे। प्रतिभास्थली केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि भावी पीढ़ियों के चरित्र निर्माण की एक सशक्त प्रयोगशाला है।

उन्होंने कहा कि यहाँ बालिकाओं को शिक्षा के साथ-साथ संस्कृति, अनुशासन, आत्मविश्वास और जीवन मूल्यों का प्रशिक्षण दिया जाता है। ब्रह्ममुहूर्त में जागरण, योग, अध्ययन तथा संयमित दिनचर्या उनके व्यक्तित्व को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बच्चों में प्रातःकाल जागने की आदत, नियमित योग और अनुशासित जीवनशैली उन्हें संस्कारवान बनाने के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक रूप से भी सशक्त बनाती है। प्रतिभास्थली की यही विशेषता है कि वहाँ विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास होता है और वे समाज के लिए आदर्श बनकर निकलते हैं।

संस्कार, शिक्षा और मर्यादा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए मुनिश्री ने कहा कि केवल बच्चों को जन्म देना या उन्हें पढ़ा-लिखा देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें उत्तम संस्कार देना सबसे अधिक आवश्यक है। संस्कारयुक्त व्यक्ति स्वयं भी श्रेष्ठ जीवन जीता है और समाज को भी सही दिशा प्रदान करता है।

उन्होंने कहा कि आज बच्चों के पालन-पोषण और शिक्षा पर पर्याप्त व्यय किया जाता है। जो परिवार अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने में सक्षम हैं, उनका यह कर्तव्य है कि वे आर्थिक रूप से कमजोर किंतु प्रतिभाशाली बच्चों की शिक्षा में भी सहयोग करें। यदि किसी एक बच्चे को भी ज्ञानार्जन का अवसर मिल जाए तो उसका लाभ केवल उसे ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को प्राप्त होता है। बेटियों के भीतर संस्कार और शिक्षा का यह दीपक अनेक जीवनों को प्रकाशित कर सकता है।

मुनिश्री ने कहा कि अच्छे संस्कारों का प्रभाव पीढ़ियों तक बना रहता है। जिस व्यक्ति को उत्तम संस्कार मिलते हैं, वह आगे चलकर अपने परिवार और समाज में भी उन्हीं मूल्यों को स्थापित करता है। इसलिए संस्कार निर्माण का कार्य सबसे बड़ा सामाजिक और धार्मिक योगदान है।
उन्होंने आगे कहा कि जीवन में विवेक और मर्यादा का पालन अत्यंत आवश्यक है। धर्म केवल पूजा-पाठ का विषय नहीं है, बल्कि जीवन के प्रत्येक व्यवहार में संयम, शुचिता और सदाचार का पालन करना ही वास्तविक धर्म है। जब व्यक्ति अपने आचरण को शुद्ध बनाता है, तभी उसका जीवन सार्थक और समाज के लिए प्रेरणादायी बनता है।
इस अवसर पर मुनि श्री गरिष्ठ सागर महाराज एवं मुनि श्री हीरक सागर महाराज मंचासीन रहे। विधान के सफल आयोजन पर समाज की ओर से विधानाचार्य संजीव भैया कटंगी का सम्मान किया गया। उपस्थित श्रद्धालुओं ने उनके द्वारा संपन्न कराए गए विधान की सराहना करते हुए धर्म प्रभावना में उनके योगदान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की।
प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि विधान का समापन संपन्न हुआ। 5 जून को प्रातः 3:30 बजे श्री सकल दिगंबर जैन समाज समिति के तत्वावधान में तीन बसें चंदेरी के लिए रवाना होंगी। समाजजन मुनि श्री अभय सागर महाराज को विदिशा में संघ सहित चातुर्मास हेतु विनयपूर्वक आमंत्रित करेंगे। साथ ही मुनिसंघ गुरुवार प्रातः किला अंदर स्थित बड़े जैन मंदिर की ओर विहार करेगा तथा आहारचर्या भी वहीं से संपन्न होगी।
— अविनाश जैन विद्यावाणी से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
