मुकाम वह हासिल करो..जब चाहो तब स्वयं को बदल सको..! अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज
परतापुर बांसवाड़ा राजस्थान
आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि मैं देख रहा हूँ — आज मनुष्य तनाव की नाव में बैठकर जीवन की यात्रा तय कर रहा है। तनाव की इस नाव से कैसे मुक्त हों-? तनाव से बाहर कैसे आएँ-? मन को स्वस्थ और प्रसन्न कैसे रखें-? स्वयं को भीतर से खुश कैसे बनाएँ-? इन सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर है — ध्यान। फिर भी हम कुछ दैनिक अभ्यासों द्वारा अपने मन को स्वस्थ और प्रसन्न रख सकते हैं। जैसे —
1) प्रतिदिन सुबह उगते हुए सूर्य की कोमल रोशनी में 5–7 मिनट बैठें और श्रद्धा भाव से सूर्य देवता को देखें।
2) दर्पण में अपनी आँखों में आँख डालकर देखें और स्वयं का नाम लेकर कहें — मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ, फिर अपने चेहरे पर एक मधुर मुस्कान लाएँ।
3) मोबाइल व्रत — सोने से एक घंटा पहले और जागने के एक घंटा बाद तक मोबाइल फोन को हाथ न लगाएँ।
4) दिन या रात में सोने से पहले 5–10 मिनट किसी महापुरुष की जीवनी या किसी श्रेष्ठ विचारक की पुस्तक पढ़ें।
5) उठने के बाद और सोने से पहले 5–10 मिनट निर्विचार होकर शांत बैठें।



जिस दिन आप इतने शांत और संतुलित हो जाएँ कि वर्तमान क्षण आपकी पकड़ में आ जाए, तब समझना कि आप ध्यान में प्रवेश के योग्य हो गए हैं।




क्योंकि ध्यान जीवन की आंतरिक अनुभूति है, जिसका प्रभाव हमारे बाह्य जीवन में स्पष्ट दिखाई देता है। इसलिए बाहरी जीवन को सफल और सार्थक बनाने के लिए मनुष्य को स्वयं ही प्रयास करना पड़ता है। क्योंकि —
जीवन लकड़ी नहीं है, जिसे आकार देने के लिए बढ़ई के पास जाना पड़े।
जीवन पाषाण भी नहीं है, जिसे कोई कारीगर तराश सके।
जीवन कागज भी नहीं है, जिसे सजाने के लिए चित्रकार की आवश्यकता पड़े।
जीवन प्राणवान है, ऊर्जावान है, चैतन्य है। जीवन लकड़ी, पत्थर और कागज की तरह जड़ नहीं है।
जीवन का सृजन और विनाश — दोनों स्वयं के हाथ में हैं..जीवन को बनाना भी स्वयं के हाथ में है और मिटाना भी…!!!
नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
