जैन धर्म में व्यक्ति पूजा नहीं, बल्कि गुणों की पूजा को महत्व दिया गया, महामंत्र जाप रोज करें नवकार केवल धार्मिक मंत्र नहीं, बल्कि शाश्वत सत्य के साथ आत्मिक उन्नति का मार्गदर्शक : सूरीश्वरजी महाराज
रावतभाटा
आचार्य जिनमणिप्रभ सूरीश्वरजी महाराज ने कहा कि नवकार महामंत्र केवल एक धार्मिक मंत्र नहीं, बल्कि शाश्वत सत्य और आत्मिक उन्नति का मार्गदर्शक है। यह मंत्र व्यक्ति विशेष की नहीं, बल्कि गुणों की वंदना सिखाता है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।
गुरुदेव सूरि सम्राट आचार्यश्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने रामगंजमंडी में मंदिर प्रतिष्ठा के महोत्सव में जाने से पहले यह बात कही।

अवंति तीर्थोद्धारक खरतरगच्छाधिपति ने बताया कि विश्व के सभी धर्मों के अपने-अपने मंत्र होते हैं। वे उनकी संस्कृति और परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं। नवकार महामंत्र अपनी व्यापकता और निष्पक्षता के कारण अद्वितीय है। इस महामंत्र में किसी भी व्यक्ति का नाम नहीं लिया गया है। इसमें पांच परमेष्ठियों-अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु-की वंदना की जाती है। यह दर्शाता है कि जैन धर्म में व्यक्ति पूजा नहीं, बल्कि गुणों की पूजा को महत्व दिया गया है।

उन्होंने अरिहंत की व्याख्या करते हुए कहा कि अरिहंत वे होते हैं, जिन्होंने अपने आंतरिक शत्रुओं क्रोध, मान, माया और लोभ पर विजय प्राप्त कर ली हो। ऐसे महान आत्माओं को नमस्कार किया जाता है। वे किसी भी नाम या रूप में हों। इसी प्रकार, सिद्ध वे हैं, जिन्होंने मोक्ष प्राप्त कर लिया है। आचार्य धर्म का मार्गदर्शन करते हैं। उपाध्याय ज्ञान प्रदान करते हैं। साधु-संत साधना के मार्ग पर चलकर समाज को दिशा देते हैं।
गुरुवर ने कहा कि नवकार महामंत्र के अक्षर तीर्थों की यात्रा के समान माने गए हैं। इस मंत्र का श्रद्धा और एकाग्रता के साथ जाप करने से व्यक्ति के भीतर शांति, संयम और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यही कारण है कि जैन धर्म के सभी संप्रदाय दिगंबर, श्वेतांबर, स्थानकवासी और तेरापंथी इस मंत्र को समान रूप से मानते हैं।
उन्होंने बताया कि विश्व शांति के उद्देश्य से 9 अप्रैल को सामूहिक रूप से नक्कार महामंत्र का जाप किया गया। गुरुदेव सूरि सम्राट ने सभी श्रद्धालुओं का आह्वान किया कि वे प्रतिदिन कुछ समय निकालकर इस महामंत्र का जाप करें। इससे व्यक्तिगत और वैश्विक स्तर पर शांति एवं सदभाव का वातावरण बन सके।
उन्होंने युवाओं को सावचेत करते हुए कहा कि मोबाइल एक उपयोगी साधन है, लेकिन उसका दुरुपयोग युवाओं को भटका रहा है। छोटे बच्चों में भी इसकी लत बढ़ती जा रही है। इससे उनके संस्कार और स्वास्थ्य प्रभावित हो रहे हैं। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को अच्छे संस्कार दें। मोबाइल का सीमित उपयोग कराएं। विश्व में बढ़ते तनाव पर आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी ने बताया कि उनका अगला विहार रामगंजमंडी मंदिर की ओर होगा। वहां 15 तारीख को प्रतिष्ठा महोत्सव मनाया जाएगा। इसके बाद नीमच में 24 और 26 तारीख को मंदिरों की प्रतिष्ठा में शामिल होंगे। आगे महाराष्ट्र, सूरत होते हुए हैदराबाद में चातुर्मास के लिए प्रस्थान करेंगे।
चिंता व्यक्त करते हुए आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी ने कहा कि अधिकांश युद्धों के पीछे अहंकार और स्वार्थ ही मुख्य कारण होते हैं। उन्होंने भगवान महावीर के अहिंसा, अनेकांतवाद और अपरिग्रह के सिद्धांतों को अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इन्हीं सिद्धांतों से विश्व शांति संभव है।
चादर महोत्सव : आस्था और ऊर्जा का अद्भुत संगम
गुरुदेव सूरि सम्राट ने जैसलमेर में आयोजित चादर महोत्सव का उल्लेख करते हुए बताया कि यह आयोजन आस्था, इतिहास और ऊर्जा का अनूठा केंद्र है। उन्होंने खरतरगच्छ परंपरा के महान आचार्य दादा गुरुदेव जिनदत्तसूरि महाराज के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनके द्वारा ओढ़ी गई चादर आज भी जैसलमेर किले के ज्ञान भंडार में सुरक्षित है। इसे अत्यंत चमत्कारी माना जाता है। इस महोत्सव के माध्यम से समाज में एकता, श्रद्धा और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। आचार्यश्री ने अपने विहार के बिछोर गांव के अनुभव साझा करते हुए बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोगों के भीतर श्रद्धा और संस्कार जीवित हैं। बिना सूचना के पहुंचने पर भी गांवों में लोग एकत्रित होकर सत्संग में भाग लेते हैं। यह भारतीय संस्कृति की विशेषता को दर्शाता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
