जन जन के महावीर भगवान महावीर, महावीर क्यों?? प्रशांत जैन खानपुर राजस्थान
आज अधिकाश जनमानस यह नहीं जानता की भगवान महावीर को महावीर क्यों कहा जाता हे? अर्थात किस कारण से भगवान महावीर का नाम महावीर है, ज्यादातर यह समझा जाता है कि निश्चित ही भगवान महावीर ने युद्ध लडे होंगे असुरों एवं दुर्जनों को नाश किया होगा जैसे की राम भक्त हनुमान जी जिन्होंने दुष्ट रावण के द्वारा अनीति करने पर सोने की लंका विध्वंस कर दी थी एवं रावण का वध करने में भगवान राम का सहायता की थी इसलिए उन्हें महावीर कहा जाता है।
लेकिन भगवान महावीर ने न तो कोई युद्ध लडा ना ही अपने जीवनकाल मे कोई शस्त्र उठाये भाइयों दुसरो पर विजय प्राप्त करना सरल है लेकिन सबसे कठिन कार्य स्वयं पर विजय प्राप्त करना है अर्थात अपनी इन्द्रियों आदि को वश में रखकर प्राणी मात्र के कल्याण की भावना रखकर दुनिया को अहिंसा का पाठ पढाया जैसा कि कहा जाता हे।

संयम क्या है?एक युद्ध अपने ही विरुद्ध
भगवान महावीर ने अपने भीतर क्षमा,संयम,ब्रह्मचर्य व आकिंचन आदि दस धर्म धारण की
जैन शास्त्र प्रवचनसार में कहा गया है
चारित्र खल्लु धम्मो
अर्थात चरित्र ही धर्म है भगवान महावीर ने चारित्र धारण किया जिसके कारण जो भी उनके सम्पर्क मे आता है रोग मुक्त अर्थात “स्वस्थ” हो जाता है।
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स्वास्थ्य’ अर्थात ‘स्व’ में ‘स्थित’ होना।
भारत में अनेक दार्शनिक एवं धार्मिक धारायें उत्पन्न हुई किन्तु उन सबने मोक्ष को परम पुरषार्थ माना और मोक्ष का अर्थ “अपने में स्थित हो जाना” अथवा “स्वस्थ” हो जाना ही है। इस “स्वास्थ्य” को जैन परम्परा में “स्वभाव” कहा गया।
भगवान महावीर ने चार प्रमुख रोग बताए-क्रोध,मान,माया,लोभ इन चार से जो जितना मुक्त हे वह उतना ही निरोग है।
भगवान महावीर ने इन चार रोगों को कषाय कहा अर्थात ये हमारे शुद्ध स्वरुपों को विकृत कर देते हैं।जो इन चार कषायों को जीत लेता हे वही जिन है ओर उस जिन का उपासक ही जैन है।
मुलतः जैनत्व एक सम्प्रदाय-निरपेक्ष किंतु मूल्य-सापेक्ष अवधारणा है।
जैन अहिंसा के लिए प्रसिद्ध है,किंतु भगवान महावीर ने हिंसा का मूल राग-द्वेष को माना हे जहां-२ राग-द्वेष हे वहां-२ हिंसा है।राग-द्वेष नहीं होगा तो दुसरों को पीडा देने का प्रसंग तो स्वतः ही उत्पन्न नहीं होगा।
भगवान महावीर ने जो अहिंसा का मन्त्र दिया उसे तो सौभाग्य से आज पुरे विश्व मे जपा जा रहा है।
भगवान महावीर की परम्परा मे एक दुसरा बहुमूल्य सिद्धांत “अनेकान्त” का मिलता हे
अनेकान्त का अर्थ है कि सत्य बहु-आयामी है।
निष्पक्षता,अपरिग्रह ओर अहिंसा एक ही सत्य के सत्य के तीन रुप हे।
अपनी गहन साधना ओर कठोर तपस्या के बल पर जिस सत्य का साक्षात्कार भगवान महावीर ने किया उस सत्य मे सबका “हित” हे अहित किसी का नहीं।
जीओ ओर जीने दो इस कारण से भगवान महावीर को महावीर कहा जाता है।
संकलित आलेख प्रशांत जेन खानपुर राजस्थान
