वक्त

काव्य रचना

वक्त

क्षणभंगुर सा होता है घड़ी से गुज़रता हुआ हर एक लम्हा,

कितनी हसरतें चाहतें पालते हैं हम इन आँखों में,

कहाँ ठहरते हैं पलछिन भागते हैं बेमुरव्वत हरदिन,

ख्वाहिशें दबी-दबी सी रहती
है दिल के किसी अंधेरे में,

रोशनी की राह तकती हैं वक्त की फिसलती सहमती
किरणें,

एक अस्तित्व एक जान हज़ार ख्वाब सहेजे रहती
है सीने में,जिंदा टुकड़ों में
रहकर,वक्त को बाँध लेती
है सीने में,,,
पूर्णिमा छाबडा जैन जयपुर

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