यशस्कीर्ति भी क्षणभंगुर है आर्यिका105 विज्ञानमति माताजी प्रसंग आर्यिका 105 आदित्यमति माताजी द्वारा आलेखित

धर्म

यशस्कीर्ति भी क्षणभंगुर है आर्यिका105 विज्ञानमति माताजी प्रसंग आर्यिका 105 आदित्यमति माताजी द्वारा आलेखित

प्रसंग ज्येष्ठ माह के तप्तायमान समय का है। सिद्धान्त तीर्थक्षेत्र शिकोहपुर में पूज्य आर्यिका श्री ने उपवास पारणा करने का मन बनाया, मन ही नहीं बनाया वरन् उपवास पारणा के किया। उस समय उनकी वैय्यावृत्ति के भाव से सायंकालीन कक्षा मैंने पढ़ायी। तब कक्षा का विषय न पढ़ाकरकुलभूषण देशभूषण महाराज की जीवन गाथा के कुछ प्रसंग सुनाये।

 

 

उनकी वैराग्यमयी गाथा सुनकर सभी के दीक्षा लेने के भाव बनने लगे। दूसरे दिन जब ब्रह्मचारी युगल एवं अन्य श्रावकगण कक्षा में आये तब उन्होंने सायंकालीन कक्षा की प्रशंसात्मक रूप चर्चा की तब उनकी हाँ में हाँ मिलाते हुए वक्तृत्व शैली की सराहना की। पहले तो मुझे प्रोत्साहन दिया पश्चात् कहीं मैं अहंकार के झूले में न झूल जाऊँ अतः बोली-माताजी कभी भी अपने किसी हुनर पर घमण्ड मत करना क्योंकि “”पत्थर जब पानी में गिरता है तो अपने ही वजन से डूब जाता है”। फिर भाई यह सब कर्म का उदय है, पुण्य का उदय है सो सभी को अच्छा लग रहा है। चाहे कोई मीठा बोले, शैली भी न हो, रोचकतापूर्ण न सुनाये तो भी यदि अंतरंग में स्कीर्ति नामकर्म का उदय है तो सभी लोग प्रशंसा करते हैं, सभी चाहते तुम्हारा मन भी नहीं होगा तो भी उनके पुण्य का उदय है, तो वह तुम्हें मजबूर करेगा यह सब करने के लिए। कोई मीठा बोलता है, प्रस्तुति का तरीका भी अच्छा है, शैली भी अच्छी है, विषय भी अच्छा है, विषयान्तर जाता है, सही तौर-तरीके से शुद्ध उच्चारण के साथ समझाता है फिर भी पुण्य का उदय नहीं है तो सभी की नाक चढ़ेगी, मुँह मरोड़ेंगे, कोई प्रशंसा करे तो भी नहीं कर पायेगा क्यों? क्योंकि उसके अंदर का पाप कर्म कुछ करने देगा। यह सब नामकर्म का खेल तमाशा है ।

यशस्कीर्ति क्षणभंगुर है, अयशस्कीर्ति है तो वह भी क्षणभंगुर है, स्थायीहै अतः हमें इसे ही सब कुछ नहीं मानना चाहिए। यह सब कर्म सापेक्ष है, संसार में उलझाने वाला है। जबकि हमारा पैर
परे है अर्थात् सभी उलझनों (चाहे पुण्य कर्मरूप हो या पाप कर्मरूप) से दूर शाश्वत सुलझन कर्मनिरपेक्ष बना है।

सारी वार्ता सुनकर मेरा हृदय गदगद हो उठा धन्य हो पूज्य आर्यिकाश्री आपको जो बाह्य धर्म प्रभावना के लिए प्रोत्साहित करती है और अंतरंग में हमारी आत्मा प्रभावना को भी बनाए रखती है ताकि हमारी कषायो की कलुषता न बढ़े, अर्थात् कषायो की मन्दता बनी रहे। ऐसा सन्मार्ग दिखाने वाली सन्मार्ग दर्शिका पूज्य आर्यिका श्री के चरणारविंद में सम्यकदृष्टि के प्रशम गुण पाने की भावना से वन्दामि। आर्यिका 105 आदित्यमति माताजी द्वारा आलेखित पुस्तक संयम साथी से लेख
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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