आज के इन्सान को धर्म का मर्म, इतना ही समझ में आ जाये कि..वे अपनी गरीबी को किस्मत समझ ले..! अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज

धर्म

आज के इन्सान को धर्म का मर्म, इतना ही समझ में आ जाये कि..वे अपनी गरीबी को किस्मत समझ ले..! अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज

अतिशय क्षेत्र देवगढ़ प्रतापगढ़ राजस्थान।

अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि जैन दर्शन कर्म सिद्धान्त को महत्व देता है। सुख-दुःख, पुण्य-पाप अच्छा-बुरा — सब हमारे अपने ही कर्मो का फल है। जैन धर्म में जातिवाद, वर्ण वाद, वंशवाद, भाषावाद, य संकुचितताओं के लिए कोई जगह नहीं है। जैन कोई जाति नहीं बल्कि “अहिंसा परमो धर्म” का नाम है।

 

 

 

जो धारण किया जाये वो धर्म। धर्म वस्तु का स्वभाव है। जैन धर्म किसी के वैर विरोध में नहीं, ना किसी मजहब में, ना सम्प्रदायवाद, ना पन्थवाद, ना सन्तवाद  से कोसों दूर है। जैन धर्म तो वस्तुनिष्ठ, प्राकृतिक धर्म है। जो सभी कामनाओं, वासनाओं से रहित, जन्म मरण से मुक्त है, वीतरागी सर्वज्ञ, हितोपदेशी है — वे जिनेन्द्र भगवान कहलाते हैं। वीतरागी भगवान ज्ञाता दृष्टा हैं लेकिन सृष्टि के कर्ता-धर्ता नहीं है।

जैन धर्म में तीर्थंकर 24 होते हैं और भगवान अनन्त होते हैं। प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभ देव [आदिनाथ] का जन्म करोड़ो, अरबों वर्ष पूर्व अयोध्या में हुआ था। उनके पिता नाभिराय तथा माता मरूदेवी थीं। नाभिराय जी का विवाह यशस्वी व सुनन्दा के साथ सम्पन्न हुआ। भरत बाहुबली उनके 101 पुत्र तथा ब्राह्मी और सुन्दरी, यह दो पुत्रियां थी। उन्होंने राज्य करते हुये, अपने पुत्र-पुत्रियों को भी अनेक कलाओं में पारंगत किया। बड़ी बेटी ब्राह्मी को लिपी-ज्ञान करवाया, और छोटी पुत्री सुन्दरी को अंक-ज्ञान कराया, जिससे शून्य व अंको का अविष्कार हुआ। भगवान ऋषभदेव ने मानव समाज को जीवन जीने की मूल विधाएँ सिखाईं — असि, मसि, कृषि, शिल्पकला, वाणिज्य और विद्या। अनेक महत्वपूर्ण कार्यों के कारण भगवान ऋषभ देव ही भारतीय संस्कृति में ब्रह्मा, विष्णु, महेश, विश्वकर्मा, प्रजापति, आदि अनेक रूपों में स्मरण किया जाता है।

 

 

इस प्रकार जैन धर्म हमें यह सिखाता है कि धर्म का सार किसी बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि अहिंसा, आत्मसंयम, सत्य और आत्मजागरण में निहित है। जो व्यक्ति अपने कर्मों को समझकर आत्मशुद्धि के मार्ग पर चलता है, वही वास्तविक अर्थों में धर्म को धारण करता है…!!! अंतर्मना गुरुदेव आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराजजी ससंघ का कल 13 मार्च 2026 को रात्रि विश्राम ओर कल 14 मार्च 2026 शनिवार की सुबह पूजा ओर आहार चर्या जैन मंदिर अतिशय क्षेत्र देवगढ, जिला प्रतापगढ़ में होगी कल दोपहर 3.30 बजे जोलन, स्कूल के लिए को मंगल विहार होगा

 

 

नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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