श्रावकों का जीवन मन,वचन,और काय के संयम और रत्नत्रय धर्म से सफल होता हैं।आचार्य वर्धमान सागर आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण का निवाई भव्य प्रवेशकर दोपहर को बिहार

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श्रावकों का जीवन मन,वचन,और काय के संयम और रत्नत्रय धर्म से सफल होता हैं।आचार्य वर्धमान सागर आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण का निवाई भव्य प्रवेशकर दोपहर को बिहार

निवाई

पंचम पट्टाधीश आचार्य वर्धमान सागर जी जैन समाज के निवेदन पर शीतकालीन प्रवास 32 साधुओं से पार्श्वनाथ नसीया संत भवन में कर रहे हैं।जबसे आचार्य श्री पधारे है प्रति सप्ताह धार्मिक अनुष्ठान होकर धर्म की गंगा बह रही हैं सिद्धचक्र मंडल विधान, प्रथमाचार्य शांति सागर स्मारक ओर प्रतिमा चरण स्थापना का राष्ट्रीय स्तरीय कार्यक्रम 71 वर्ष पूर्व निर्मित 41 फीट के मानस्तंभ में विराजित श्री जी का भव्य पंचामृत अभिषेक 28 जनवरी को होगा। 27 जनवरी को याग़ मंडल विधान की पूजन हुई।

आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघस्थ 83 वर्षीय आर्यिका शीतलमति माताजी ने दिनांक 23 जनवरी को चारों प्रकार के आहार का त्याग कर यम संलेखना धारण कर ली।अब पूज्य माताजी निर्जल बिना जल के उपवास कर तप साधना , आत्मा का चिंतन कर रही हैं 27 जनवरी को 5वा उपवास हैं गुरुभक्त राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य वर्धमानसागर ,मुनि हितेंद्र सागर , प्रभव सागर ,चिंतनसागर , दर्शितसागर , प्रबुद्ध सागर , मुमुक्षुसागर,प्रणीतसागर, ध्येयसागर भुवन सागर,आर्यिका शुभमति,शीतलमती ,चैत्यमती,विलोकमति ,दिव्यांशु मति ,पूर्णिमामति , मुदितमति विचक्षणमति ,समर्पितमति ,निर्मुक्तमति विनम्रमति,दर्शनामति ,देशनामति ,महायशमति,देवर्धिमति,प्रणतमति ,निर्मोहमति, पद्मश मति ,दिव्ययशमति,,प्रेक्षामति जिनेशमति, ऐलक हर्षसागर ,क्षुल्लक प्राप्तिसागर , सभी साधु उपस्थित रहे ।इस अवसर पर आचार्य श्री ने धर्म सभा में माताजी को संबोधित कर देशना में बताया कि केवलज्ञान लक्ष्मी से जैनधर्म विभूषित है।जैन धर्म के अंतर्गत सर्वोच्च सिद्ध अवस्था का मार्ग बतलाया गया है।अनंतानंत भव्य आत्माये इस मार्ग पर चलकर सिद्ध हुए हैं।संयम धारण करने से जीवन सार्थक होता है। जन्म अनेक लेते हैं किंतु सभी संयम अपनाते नहीं है ।जन्म के साथ मरण भी लगा हुआ है जन्म मरण की सार्थकता सम्यक दर्शन,ज्ञान और सम्यक चारित्र की साधना कर संलेखना से मृत्युंजय मृत्यु पर विजय पाने का पुरुषार्थ से होती हैं आर्यिका श्री शीतलमति माताजी ने चोपन वर्ष पूर्ण कर आर्यिका दीक्षा ली , जन्म वैराग्य संयम के महान कार्यों से सफल होता है। सर्वश्रेष्ठ अवस्था सिद्ध अवस्था होती हैं राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य वर्धमानसागर ने उपदेश में आगे बताया कि शीतलमति ने अपने मन को दृढ़ करते हुएबसंतपंचमी के दीक्षा दिन पर संपूर्ण चारों प्रकार के आहार का त्याग कर यम संलेखना धारण की है ।संलेखना शरीर और कषाय को क्रश करने से सफल होती है उपवास से शरीर को ओर आत्मा में लगे कर्मों को साधना तप बल से हटाया जाता हैं उत्साह और भक्ति से धर्म पुरुषार्थ करना चाहिए इससे आत्मा का कल्याण होता है और अन्य को भी संयम धारण करने की प्रेरणा मिलती है ।श्रावक का मानव जीवन मन वचन काय के संयम से सफल होता है। साधु की समाधि देखना सेवा करना तीर्थ यात्रा समान होती हैं उत्कृष्ट समाधि होने पर क्षपकसाधु अगले दो से आठ भव में निश्चित रूप से सिद्ध अवस्था को प्राप्त करते हैं।

जैन समाज के पवन बोहरा,हेमंत बाबी,सुशील मोहित ने बताया कि आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी का धूमधाम से मंगल प्रवेश हुआ माताजी ने श्री जी के दर्शन के बाद आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के संघ सहित दर्शन किए धर्म सभा में आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी ओर आचार्य श्री के प्रवचन हुए दोपहर को आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी का आहार के बाद निवाई से चाकसू की ओरमंगल बिहार हुआ।

राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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