अन्य क्षेत्रों पर किया गया पाप तो धर्म क्षेत्र पर जाकर घुल जाता है लेकिन धर्म क्षेत्र में किया गया पाप व्रज लेप के समान चिपक जाता है जिसे मिटाना अत्यंत कठिन होता है संभव सागर महाराज
विदिशा
“अन्य क्षेत्रे कृतं पापं धर्म क्षेत्रे विनश्यति,धर्म क्षेत्रे कृतं पापं वर्ज लेपो भविष्यति” अर्थात अन्य क्षेत्रों पर किया गया पाप तो धर्म क्षेत्र पर आकर धुल जाता है,लेकिन धर्म क्षेत्र में किया गया पाप वज्र के लेप के समान दृढ़ता से चिपक जाता है, जिसे मिटाना अत्यंत ही कठिन होता है”
उपरोक्त उदगार निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108संभव सागर महाराज ने श्री शांतिनाथ दिगंवर जैन मंदिर में प्रातःकालीन धर्मसभा में व्यक्त किये उन्होंने कहा कि भक्ती की चासनी में इतने अधिक डुब जाओ कि अंदर के रस का आनंद उठा सको प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया प्रातःकाल मुनि श्री शीतलधाम पहुंचे एवं नये वर्ष के दूसरे दिवस चतुर्दशी को वर्रों बाले बाबा भगवान आदिनाथ स्वामी का मस्तकाभिषेक एवं शांतीधारा मुनि श्री के मुखारविंद से संपन्न हुई।
इस अवसर पर मुनि श्री ने कहा कि साधु बिना प्रयोजन नहीं चलता यहा से शीतलधाम की दूरी 2.2 कि.मी है यदी प्रतिदिन जो व्यक्ति पैदल चलकर जाये और भगवान का अभिषेक करे तो आप अधिक स्वस्थ्य रह सकेंगे। “पहले के लोग इसीलिये बहुत सहनशील हुआ करते थे,क्योंकि वह अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखते थे,वही आजकल हम देखते है कि धर्म क्षेत्र में भी जल्दबाजी दिखाई देती है,और सहनशीलता के अभाव में एक दूसरे को कटाक्ष कर बैठते है और उसी का परिणाम है कि धर्मक्षेत्र में भी हम अपने आपको पूर्वाग्रह से बांध लेते है” उन्होंने भगवान पारसनाथ की सहनशीलता का उदाहरण देते हुये कहा कि हमारे अंदर उनके जैसे गुण तो प्रकट नहीं हो सकते यह में भी जानता हूँ, लेकिन थोड़े बहूत गुण तो आना ही चाहिये आजकल हम देखते है कि धर्म के क्षेत्र में भी अभिषेक को लेकर या मंदिर या बेदी को लेकर ही कषाय भड़क जाती है ऐसा नहीं होंना चाहिये।





मंदिर जी में यदि कोई नया व्यक्ति आया है और उससे यदि कोई गलती हो रही है तो उसे आराम से समझा सकते है लेकिन आप लोग तो वही शांतिप्रसाद से ज्वाला प्रसाद बनकर और अधिक कर्म बांध लेते है उन्होंने कहा कि जिनके अंदर धर्म कूटकूट कर भरा होता है,वह कैसी भी परिस्थिति आ जाये विचलित नहीं होते बल्कि अपनी सहनशीलता से दूसरों के सबक का कारण बनते है।
उदाहरण देते हुये कहा कि माता सीता को गर्भावस्था में ही सेनापति कृतान्त वर्क राजा का आदेश मानकर घनघोर जंगल में छोड़ वापिस आने लगता है तो सीता माता ने कितना धैर्य धारण किया होगा विचार कीजिये? उनके स्थान पर आप माताए होती तो आपके परिणाम क्या होते? थोड़ा विचार कीजिये उन्होंने कहा कि यह सहनशीलता भक्ती रूपी चासनी में डूबने पर ही मिलती है जैसे गुलाब जामुन जितने देर तक शकर की चासनी में अंदर तक डूबा रहता है वह पूर्णता मिठास का आनंद देता है और यदि ऊपर ही ऊपर से निकाल लिया जाए तो वह उतनी मिठास नहीं देगा प्रभु भक्ती की चासनी में अपने आपको इतना अधिक डुबो लो कि जीवन आनंदमय हो जाये।
मुनि श्री ने क्रिकेट का उदाहरण देते हुये कहा कि जो खिलाड़ी जितना अधिक धैर्य से पिच पर खेलता है,तथा विकेट को सुरक्षित रखते हुये खड़ा रहता है,वह अधिक से अधिक रन बटोर लेता है,और जो जल्दबाजी में आकर विकेट ही गिरा देता है वह जल्द पवेलियन में लौट जाता है उसी प्रकार घर परिवार और व्यवसाय में जो अपने कर्तव्य का पूर्ण निर्वाहन के साथ धैर्य से खड़ा रहता है वही व्यक्ति अपने जीवन में सफल होता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312


