▫श्रमण संस्कृति के सुमेरु यथाजात सुमेर आचार्य श्री विद्यासागर जी
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का सिद्धक्षेत्र नैनागिरिजी (छतरपुर, मध्यप्रदेश) में 1982 का वर्षायोग संपन्न होने के उपरांत २ दिसंबर, 1982 को वहाँ से विहार कर बंडा, दमोह, कटनी, शहडोल, अम्बिकापुर, डाल्टनगंज, हजारीबाग एवं ईसरी होते हुए 24 जनवरी, 1983 को आचार्यश्रीजी ससंघ शाश्वत तीर्थराज श्री सम्मेद शिखरजी की वंदनार्थ मधुवन (गिरीडीह, बिहार) पहुँचे थे। वहाँ से आकर ईसरी नगर में ग्रीष्मकालीन वाचना एवं वर्षायोग- 1983 भी संपन्न होने के पश्चात् कार्तिक शुक्ल द्वितीया, रविवार, विक्रम संवत् 2040, 6 नवंबर, 1983 को विहार कर पश्चिम बंगाल की राजधानी कलकत्ता की ओर आचार्यश्रीजी ने ससंघ विहार किया था।
कलकत्ता में कार्तिक पूर्णिमा की ऐतिहासिक रथयात्रा संपन्न होने के बाद कलकत्ता से खण्डगिरि- उदयगिरि तीर्थक्षेत्र (भुवनेश्वर, उड़ीसा) की वंदनार्थ आचार्यवर्य पहुँचे थे। तदुपरांत कटक होकर अंगुल नगर, उड़ीसा के आसपास किसी ग्राम में आचार्य संघ के आहारचर्या संपन्न हुई थी। सारा संघ सामायिक में लीन हो गया। तभी कलकत्ता के श्रावकों को सूचना मिली कि उस *ग्राम के जैनेतर बंधुओं ने आए हुए दिगम्बर साधुओं को लाठी से मारने की योजना बनाई है।* वे तुरन्त ही कुछ पुलिस फोर्स को लेकर वहाँ आ गए। उन्होंने संघ को बाहर न निकलने का निवेदन किया। जहाँ संघ सामायिक कर रहा था वहाँ पर ताला डाल दिया।

*आचार्यश्रीजी सामायिक से उठे और बोले- ‘कुछ नहीं होगा, ताला खोलिए।’* परन्तु श्रावक डरे हुए थे। उन्होंने पुनः कुछ सख्त होकर ताला खोलने का पिच्छी से इशारा किया। श्रावकों को ताला खोलना पड़ा। *आचार्यश्रीजी स्वयं सबसे आगे हो गए, सारे संघ को एवं श्रावकों को अपने पीछे रखा और आदेश दिया- ‘कोई कुछ भी नहीं बोलेगा।’ फिर आचार्यश्रीजी कमरे से बाहर निकले, तो देखा पूरी सड़क पर जैनेतर बंधु हाथों में लाठी लिए खड़े हैं। उन्होंने उन सबकी तरफ दृष्टि भर कर मात्र देखा, वे सभी सड़क के दोनों ओर दो भागों में विभाजित हो गए और बीच का मार्ग खाली हो गया। फिर आचार्यश्रीजी ने अपनी पिच्छी ऊपर उठाकर तीन बार उनके सामने घुमाई । सब एकदम शांत हो गए। हाथों की लाठियाँ नीचे झुक गईं, सारा संघ आराम से वहाँ से निकल गया।*
यह है दिगम्बरत्व कि महिमा,यथाजात मुद्रा जिन्हें देवता भी नमस्कार करते है।
