अपरिग्रह को जीवन को मूल मंत्र मानकर चेतना जगाने वाले अग्रणीय व्यक्तित्व थे भामाशाह

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अपरिग्रह को जीवन को मूल मंत्र मानकर चेतना जगाने वाले अग्रणीय व्यक्तित्व थे भामाशाह

जन्मदिवस पर विशेष

हम ऐसे व्यक्ति की बात कर रहे है जो धन वैभव की संपन्नता होने पर भी  अपरिग्रह को जीवन को मूल मंत्र मानकर चेतना जगाने वाले अग्रणीय व्यक्तित्व था जी हा हम बात कर रहे है वीर भामाशाह की यह बचपन से ही महाराणा प्रताप के परम मित्र,विशेष सहयोगी के साथ एक विश्वासपात्र सलाहकार थे। भामाशाह को अपनी मातृ-भूमि के प्रति अगाध प्रेम था और उनकी दानवीरता के लिए इनका नाम इतिहास में अमर था और अमर रहेगा

यदि हम उनके जीवन पर प्रकाश डाले तो  इनका जन्म मेवाड़ में 29 अप्रैल 1547 को जैन धर्म में हुआ। यह सभी जानते है की भामाशाह का समर्पित सहयोग महाराणा प्रताप के जीवन में महत्वपूर्ण और कारगर साबित हुआ। भामाशाह एक महान व्यक्ति थे जिसका पता इस बात से लग जाता है उन्होने  मातृ-भूमि की रक्षा के लिए महाराणा प्रताप का सर्वस्व नष्ट हो जाने के बाद भी उनके लक्ष्य को सर्वोपरि माना इसे सब कुछ मानते हुए अपनी समस्त धन-संपदा को उनको अर्पित कर दिया। यह उन्होने तब किया था जब महाराणा प्रताप अपना अस्तित्व बचाने के     के प्रयास में निराश हो गए थे और अपने परिवार के साथ पहाड़ियों पर छिपते हुए भटक रहे थे। उनको दिल्ली की गद्दी का प्रलोभन दिया लेकिन उन्होने मेवाड़ की आन बान शान की रक्षा के लिए दिल्ली गद्दी का प्रलोभन भी ठुकरा दिया। महाराणा प्रताप को दी गई उनकी हरसम्भव मदद   ने मेवाड़ के आत्म सम्मान एवं संघर्ष को नई दिशा दी।

भारतीय इतिहास में मेवाड़ोद्धारक दानवीर भामाशाह का नाम बड़े ही गौरव के साथ लिया जाता है। जाता रहेगा  भामाशाह एक स्वामिभक्त एवं दानवीर होने के साथ—साथ जैनधर्म के परम श्रद्धालु श्रावक थे।उस क्षण को कोई सुने तो वह अपने को भाव विहल होने से नहीं रोक सकता भामाशाह ने  हल्दी घाटी के युद्ध में शिकस्त खा चुके  महाराणा प्रताप के लिए उन्होंने अपनी निजी सम्पत्ति में इतना धन वैभव  दान कर दिया था कि जिससे 25000 सैनिकों का बारह वर्ष तक जीवन निर्वाहन हो सकता था। इससहयोग से महाराणा प्रताप में नया उत्साह प्रस्फुटित हुआ और उन्होने दोबारा सैनिक     शक्ति को संगठित किया और मुग़ल शासको को  करारी शिकस्त देकर पुनः मेवाड़ का राज्य प्राप्त किया था।

आपको बता  दे भामाशाह का जीवनकाल 52 वर्ष का रहा। उनके मातृ-भूमि के प्रति अगाध प्रेम उनकी दानवीरता के कारण उदयपुर राजस्थान में राजाओं की समाधि स्थल के मध्य भामाशाह की समाधि बनी है। वही इस महाभिभुती के सम्मान 31 dec 2000 को 3 रुपये का डाक टिकट जारी किया गया। सचमुच भामाशाह अपरिग्रह की चेतना जगाने एक वाले अग्रणीय व्यक्तित्व थे इतना ही नहीं आज भी कोई दान अनुदान करता है तो उन्हे उनके नाम से पूर्व भामाशाह कहकर सबोधित किया जाता है व जैन जगत का गोरव ही नहीं समस्त राष्ट्र का गोरव है

संकलित अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

 

 

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