आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज का हुआ मंगल विहार भक्तों ने नम आंखों से दी विदाई
रामगंजमंडी
आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज का वर्षायोग पंचकल्याणक महोत्सव संपन्न कर नगर से हुआ मंगल विहार यह वर्षायोग कही मायने में आस्था श्रद्धा का एक पर्याय बना युवा शक्ति में धर्म की अलख जगाने का एक पर्याय बना आचार्य श्री के सानिध्य में युवा सेमिनार, दंपति सेमिनार, श्रावक संगोष्ठी, अष्ट मूलगुण संस्कार, बाल संगोष्ठी महोत्सव जैसे आयोजनों के द्वारा गुरुदेव ने सभी को धर्म से जोड़ा इन आयोजनों में परम पूज्य मुनि श्री 108प्रांजल सागर महाराज, प्रत्यक्ष सागर महाराज का विशेष सहयोग रहा।
चार सूत्र हमेशा याद रखे आचार्य श्री
बिहार से पूर्व संध्या पर प्रशांत जैन आचार्य ने आचार्य श्री से प्रश्न पूछा हम ऐसा क्या करे कि यह चतुर्मास हमारी स्मृति पर बना रहे
आचार्य श्री ने कहा चार सूत्र याद रखो
1.धार्मिक कार्य करते हुए मान सम्मान की इच्छा नहीं करना
2. व्यवहार बिगड़ जाए पर धर्म ना बिगड़े
3.देव शास्त्र गुरु के प्रति विकल्प नहीं करना
4. अपना (निजात्मा) का ध्यान रखें।
जैसे ही दोपहर की बेला में गुरुदेव का विहार हुआ सभी की आंखें भर आई बस सभी यह कह रहे थे उड़ चला पंछी रे, हरी भरी डाल से रोको रे कोई मुनि को बिहार से सुनी पड़ी है आज नगरी की गालियां विनती हमारी गुरुवर पुनः स्वीकारीये एक बार गुरुवर मेरे पुनः लौट आईये,महावीर के रघुनंदन कृपा ऐसी कीजिए भूल हुई गुरुवर हमसे क्षमा दान दीजिए। रोको रे रोको रे कोई इनको विहार से नगर से ऐसी विदाई हुई जो भूतों न भविष्यती है
दोपहर की बेला में मुनि श्री 108 प्रत्यक्ष सागर महाराज ने भावुक उद्बोधन दिया मुनि श्री 108 प्रांजल सागर महाराज ने उद्बोधन देते हुए कहा कि आना भी जरूरी था जाना भी जरूरी है पूरे देश और समाज को रामगंज मंडी की भगवान आत्माओं के बारे में कैसे बताएंगे कि आपने कैसे धर्म प्रभावना की
आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने अपना अंतिम उद्बोधन देते हुए कहा कि संत अगर चलते रहते हैं तो शुद्धता बनी रहती है अगर रुक जाते हैं तो अशुद्धता घर कर लेती है। उन्होंने आचार्य श्री 108 विराग सागर महाराज का जिक्र करते हुए कहा कि गुरुदेव कहते थे कि चलते रहो चातुर्मास का समय है तो रुको शीतकाल हो तो रुको बाकी विहार करते रहो। उन्होंने कहा जब तक मुक्ति नहीं मिलेगी तब तक छोड़ते भी रहेंगे और ग्रहण भी करते रहेंगे।
भारतीय संस्कृति का उल्लेख करते हुए गुरुदेव ने कहा कि भारतीय संस्कृति की परंपरा है कि मेहमान को छोड़ने और लेने जाते हैं। लेकिन वर्तमान के मोबाइल युग ने संस्कृति समाप्त हो रही है लोग कहते हैं कि हम बुक कर देंगे भौतिक सभ्यता से अनुशासन और संस्कृति पर चोट हुई है।

आचार्य श्री ने कहा कि गुरु का दृष्टिकोण अस्थिर होता है जो लोक हित भी होता है और आत्म हित में भी होता है। गुरु को समझोगे तो अपने आप को समझोगे यदि गुरु को समझ लिया तो अपने आप को समझ लिया।
उन्होंने कहा का नीति कहती है कि गुरु को पूजना चाहिए। धर्म कहता है देव शास्त्र गुरु को पूजना चाहिए।
दिगंबर साधु के लिए कहा गया है कि तुम्हें गुरु के अनुसार चलना है। उन्होंने स्वाध्याय और जिनवाणी पढ़ने की बात सभी से कहीं। तीर्थंकर वाणी जो हृदय में आती है वही कल्याणकारी है।

गुरु समाज और आत्म हित में कार्य करते हैं। अब समय आ गया है जाने का। मैं आप सभी को सबसे बडा उपदेश देता हूं कि धर्म से जुड़े रहे हैं और धर्म को ना छोड़े। श्वास के अंतिम क्षण तक धर्म बना रहे। उन्होंने रामगंजमंडी की भक्ति श्रद्धा समर्पण की जमकर सराहना की।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312






