आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में दो दिवसीय विनिश्चय संगोष्ठी का हुआ शुभारंभ यहां जैन दर्शन के अनमोल रतन बैठे हैं जिन्होंने जिनवाणी के रहस्यों का प्रचारित करने का बेड़ा उठाया है यह सामान्य नहीं आचार्य श्री
रामगंजमंडी
परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में संपूर्ण भारतवर्ष से आए विद्वत जनों की दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। 2 दिन में पधारे हुए विद्वत आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज द्वारा रचित आगमोदय ग्रंथ पर अपने आलेख प्रस्तुत करेंगे एवं इस पर चर्चा करेंगे।
सोमवार की बेला में आचार्य श्री के सानिध्य में विद्वत संगोष्ठी का शुभारंभ आचार्य श्री 108 विराग सागर महाराज का चित्र अनावरण दीप प्रज्वलन कर किया इसके उपरांत सभी ने विद्वत जन ने श्रीफल समर्पित कर मंगल आशीर्वाद लिया सभी विद्वत जन ने आचार्य श्री के चरणों का पद प्रक्षालन किया एवम शास्त्र भेंट किए समारोह का कुशल संचालन विद्वत आशीष जैन बम्होरी ने किया।

रजत षट्खंडागम ग्रंथ की स्थापना की
धवला पुस्तक षट्खंडागम ग्रंथ जो रजत पत्र पर बनकर आई उसकी स्थापना समाज अध्यक्ष दिलीप विनायका,उपाध्यक्ष चेतन बागड़िया,उपाध्यक्ष कमल लुहाड़िया, मंत्री राजीव बाकलीवाल के साथ भूपेंद्र सांवला, मनोज बड़जात्या, जम्बू मितल आदि ने की।
आचार्य श्री द्वारा रचित आगमोदय ग्रंथ पर आधारित विषयों पर विद्वानों ने आलेख प्रस्तुत किया एवं उस पर चर्चा की।
आचार्य श्री द्वारा रचित यह ग्रंथ जिसमें सभी ग्रंथों का सार निहित है इसमें चारों अनुयोगों का भी वर्णन है साथ ही चक्रवर्ती का वैभव एवं उनके त्याग के विषय में भी इसमें विस्तृत विवरण है। विद्वानों ने बताया कि जैन दर्शन में गुणों की नहीं व्यक्तित्व की पूजा होती है। इस बात पर भी जोर दिया है की व्रत के बिना जीवन अधूरा होता है। इसलिए व्रत नियम संयम श्रावकों को धारण करना चाहिए। और कहा कि जिस दिन हम व्रत करते हैं उस दिन अशुभ कर्म रुक जाता है। 

जिसमें विशेष रूप से तत्व का चयन किया है वह विनिश्चय है श्रेयांश कुमार शास्त्री
अखिल भारतीय शास्त्री परिषद के अध्यक्ष श्री श्रेयांश कुमार जैन बड़ौत ने अपने आलेख में आचार्य श्री विनिश्चय सागर द्वारा रचित ग्रन्थ एवम आचार्य श्री के व्यक्तित्व का गुणानु बात करते हुए कहा कि जिसमें विशेष रूप से तत्व का चयन किया है वह विनिश्चय है। यह ग्रंथ आचार्य श्री की बहुत सूक्ष्म प्रज्ञा का प्रतिफल है यह कला प्रतिभाशाली के पास ही होती है जिन्होंने संक्षिप्त चार्ट के रूप में 100 ग्रंथों का सार एक ग्रंथ में किया यह बहुत बड़ी बात है इतने से छोटे ग्रंथ में 100 ग्रंथों की साम्रगी है।
यहां जैन दर्शन के अनमोल रत्न बैठे हैं आचार्य श्री
अपने उद्बोधन में आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने कहा कि जैन दर्शन एक अलग दर्शन है जिसमें संपूर्ण सत्य के अलावा और कुछ भी नहीं होता यह दर्शन मनगढ़ंत बात नहीं करता जो जैसा है वह वैसा ही है। परिवर्तन पर्याय द्रव्य वही है। यदि इसके विपरीत ज्ञान है तो वह मिथ्या हैऔर जो जैसा है उसे मानना।
सम्यक दर्शन की भूमिका में बात करते हुए गुरुदेव ने कहा कि सम्यक ज्ञान का मतलब सत्य का ज्ञान करना है सत्य का श्रद्धान करना है। विद्वत्त संगोष्ठी के विषय में बोलते हुए गुरुदेव ने कहा की चर्चा तो बहुत होती है सौभाग्य जागृत होता है जब हम एक साथ बैठकर चर्चा करते हैं वह माध्यम है संगोष्ठी विद्वत जनों की ओर अपना ध्यान आकृष्ट करते हुए गुरुदेव ने कहा कि यहां जो बैठे हैं वह जैन दर्शन के अनमोल रतन है जिन्होंने जिनवाणी के रहस्यों को आगे लाने का बेड़ा उठाया है जो सामान्य नहीं है। आचार्य श्री ने कहा कि ग्रंथ का मौलिक चिंतन होना चाहिए लेकिन आगम के बाहर नहीं होना चाहिए। आगम ने जैसा कहा है वैसा स्वीकार करना चाहिए। स्वाध्याय करने से आगम के रहस्य समझ में आने लगते हैं। आचार्य श्री ने अति सुख अति दुख को खतरनाक बताया जब यह दोनों ज्यादा होते हैं तो मर्यादा समाप्त होती है यह प्रैक्टिकल है। जब यह दोनों ज्यादा होते हैं तो विनय छूटता है। उन्होंने सूतक पातक में धर्म करने की मर्यादा को बनाएं धर्म करने के लिए मना नहीं किया गया है द्रव्य पूजा नहीं करके भाव पूजा करें आपको जो स्तोत्र पाठ पूजन आदि आती है उसका मन से जाप करें। व्रत का भी पालन है और व्रत की क्रियाओं का भी
हमें वह समझना है जो आगम कह रहा है। हम सुने सबकी लेकिन माने आगम की अगर आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी महाराज भी यदि आगम अनुसार कह रहे हैं तो उसकी कीमत अमूल्य है उसकी कीमत कोई दे नहीं सकता किसी भी बात को आगम अनुसार देखे फिर हम निर्णय करे। विद्वत संगोष्ठी के विषय में कहा जिन्हें तीर्थंकर वाणी का बहुमान है उन्हें तीर्थंकर वाणी के ज्ञाताओ से भी लगाव है। आचार्य श्री ने कहा तीर्थंकर वाणी का सबसे अच्छा प्रचारक विद्वान है।
दोपहर के सत्र भी वक्ताओं ने अपने भाव रखे वक्ताओं ने आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज के विषय में कहा कि आचार्य श्री को पद के प्रति कोई मोह नहीं है उनके अंदर निर्मोहिता है। दोपहर के सत्र में मुनियों के आहार एवम संलेखना समाधि आदि पर विद्वत जन ने अपने आलेख प्रस्तुत किए।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312





