समाधि – दिवस भाद्र शुक्ल दोज25 अगस्त पर विशेष आलेख*बीसवीं सदी के उपसर्ग विजेता हैं आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज*

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समाधि – दिवस भाद्र शुक्ल दोज 25 अगस्त पर विशेष आलेख*बीसवीं सदी के उपसर्ग विजेता हैं आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज*

सच्चे देव-शास्व गुरू जैन संस्कृति के मूल बिन्दु है। भारत देश महान है जहाँ त्याग, तप, साधना एवं चारित्र प्रधान माना जाता है। इसी भूमि पर शाश्वत तीर्थ अयोध्या है, और सम्मेद शिखर जी झारखण्ड में है। इसी भूमि से तीर्थकरों ने जन्म व मोक्ष प्राप्त कर सिद्ध शिला पर विराजमान हुए हैं। आचार्य भगवन्तों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य संयम पथ पर चल कर सिद्ध शिला पर बैठना है।

 

 

हमारे बीतरागी संत आचार्य महान हैं, वो अपना कल्याण के साथ-साथ जीव जगत का भी कल्याण करते हैं, उनके अनेकों उपकार हैं।आचार्यों का जो योगदान समाज व राष्ट्र को प्राप्त होता है वह अतुलनीय है। उनके उपकारों की तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती।

 

बीसवीं शताब्दी के प्रमुख आचार्य, महापुरूष चारित्र चक्रवर्ती 108 श्री शान्तिसागर जी महाराज हुए हैं।बन्धुओं, आपको यह जानकारी होगी कि भारतीय संस्कृति के आद्य प्रणेता प्रथम तीर्थकर भगवान ऋषभदेव थे, वर्तमान शासन नायक 24वें तीर्थकर भगवान महावीर स्वामी के काल तक श्रमण मुनि परम्परा अक्षुण्ण चली आ रही थी। किन्तु दिगम्बर मुनि परम्परा अठाहरवीं व उन्नीसवीं सदी में विलुप्त हो चली थी यानि दिगम्बर मुनि के दर्शन करना असम्भव था।

 

ऐसी स्थिति में दिगम्बर मुनि परम्परा को पुनः जीवित कर दिखाया आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज ने महानुभाव, आचार्य शान्तिसागर जी महाराज का समाधि दिवस भाद्र शुक्ल दोज 25 अगस्त को है। ऐसे युग श्रेष्ठ के सम्बन्ध में हम उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर जानना उचित समझते हैं और उनको हम इस अवसर पर याद करते हुए नमन करते हैं, और उनके उपकारों को भी नमन करते हैं।

 

यह सर्व विदित है कि सूर्य का उदय पूर्व दिशा से होता है किन्तु जिनशासन के इस सूर्य का उदय दक्षिण भारत में कर्नाटक के बेलगांव जिले के छिकोडी तहसील के “बेलगुल” गाँव में भीमगोड़ा पाटिल की धर्मपत्नी श्रीमती सत्यवती जी के गर्भ में बुधवार, 25 जुलाई 1872 आषाढ़ कृष्ण 6 विक्रम संवत 1929 को पुण्यशाली बालक गौडा के रूप में क्षत्रिय वंश में हुआ। उनकी मूल भाषा मराठी थी ये तीन भाई एक बहिन थी। इनकी लौकिक शिक्षा मात्र तीसरी कक्षा थी। संस्कार शील माता-पिता के द्वारा घर में ही धार्मिक लौकिक संस्कार प्रदान किये गये, वो ही उनका जीवन धारा बना आप एक प्रतिभावान व बुद्धिमान छात्र के रूप में प्रसिद्ध हुए। आपका विवाह मात्र 9 वर्ष की अल्प आयु में हो गया। संयोग से छः माह पश्चात ही विवाहित पत्नी का स्वर्गवास हो गया। आप बाल ब्रह्मचारी जैसे ही रहे, आपने फिर कभी दूसरा विवाह नहीं किया।

 

आप 17-18 वर्ष की आयु में ही दीक्षा लेना चाहते थे लेकिन आपके पिताजी ने कहा कि जब तक वो जीवित हैं तब तक घर में ही रहकर धर्म साधना करें। आपका प्रत्येक कदम वीतरागिता की ओर या 15 वर्ष की आयु में ही आपने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया। 32 वर्ष की आयु में आपने घी व तेल का त्याग कर दिन में एक बार भोजन करने का नियम ले लिया।

 

आपका दयामयी व करुणामयी जीवन , आप खेती करते, लेकिन कभी भी आपने खेत से पक्षी व पशुओं को नहीं भगाया। आप कपड़े का व्यवसाय करते थे तो स्वंय ग्राहक से बोलते स्वंय नाप लीजिये और फाड़ लीजिये और उधार भी देते तो उनको बहीखाते में लिखने के लिए बोल देते थे।

 

आप हमेशा मुनिराजों की चर्चा में सहायक बनते थे। 43 वर्ष की आयु में आपने क्षुल्लक दीक्षा ली। 1920 में देवेन्द्र कीर्ति मुनिवर से मुनिदीक्षा ग्रहण कर ली। समडोली ग्राम में है अक्टूबर 1924 में आपको आचार्य पद से अलंकृत किया गया, इसी दिन आपने 2 मुनि दीक्षा और एक आर्यिका दीक्षा, एक ऐलक दीक्षा दी और चतुर्विद संघ स्थापित हुआ।

 

आचार्य श्री आगम आज्ञानुसार आहर चर्या पर निकलना प्रारम्भ किया, ग्रहस्थों को पडगाहन विधि का ज्ञान न होने से उनकी विधि नहीं मिलती और उपवास हो जाया करता था। तब समाज के भक्तों ने उपाध्याय श्री से कठोर शब्दों में कहा तब शास्त्रोक्त विधि बतलाई तब पहुंगाहन हुआ। यह आचार्य शान्तिसागर जी महाराज का श्रमण संस्कृति पर उपकार था। आपने सन् 1930 में करुणाभाव प्रकट कर संघ को आक्रमण होने से बचाया।

 

सन् 1931 में सरकार का काला कानून आचार्य श्री ने स्वयं मौन व ध्यान में बैठकर, शान्त युद्रा को देखकर सैकड़ों लोग शासन-प्रशासन नतमस्तक हो गये और दिगम्बर मुनियों को स्वतन्त्र रूप से विचरण की संस्कार की ओर से अनुमति हुई।

 

आपकी त्याग, तपस्या, चर्या, चारित्र के अंगों पर विजय प्राप्त कर आत्म सिद्धि का मार्ग प्रशस्त किया 1937 में गजपंथा जी में चारित्र चक्रवर्ती पद में अलकृत किया गया। आप के करकमलों में अनेक आचार्य, मुनि दीक्षित हुए।

 

श्रमण जगत में महामुनीन्द्र चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शान्तिमागर जी महाराज का सर्वोपरि स्थान रहा है। उन्होंने अपने तप, त्याग, संघ पालन कर, मुनिमार्ग को आगमोस्त बनाया। वर्तमान में आज जो भी श्रमण संस्कृति के साधक हैं, मुनि उपाध्याय, आचार्य विद्यमान है वे उन्हीं मुनिराज की कृपा से है। आचार्य श्री उपसर्ग विजेता के नाम से भी प्रसिद्ध हुए, आप कौन्स गुफा में ध्यान के समय एक सर्प दो घंटे तक लिपटा रहा। द्रोणगिरी में आचार्य श्री के पास शेर बैठा रहा किन्तु आचार्य श्री सामायिक में लीन थे, सामायिक से उठे तो शेर भी. चला गया। आचार्य श्री की कठिन तपस्या से नागराज वनराज भी नतमस्तक हो जाते थे।

 

आचार्य श्री का जैन समाज, श्रमण संस्कृति, राष्ट्र के लिए महान उपकार है जिसे युगों युगों तक भुलाया नहीं जा सकेगा। वे अत्यन्त सुलझे हुए, प्रशान्त, निस्पृह, श्रेष्ट जीवन वाले चिंतक, अहिंसक सन्त थे।

 

आचार्य श्री 36 वर्ष के दीक्षित मुनि के लगभग 25 वर्ष उपवास में ही व्यतीत हुए है। और कुन्थलगिरी में संलेखना पूर्वक 28 अगस्त 1955 भाद्र शुक्ला दोज के दिन प्रातः 6:50 बजे ॐ सिद्धाय नमः उच्चारण के साथ उत्कृष्ट वीरमरण को प्राप्त कर समाधीमरण का एक ज्वलन्त उदाहरण आने वाली पीढ़ी को प्रदान किया।

 

परमपूज्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज का जीवन महान रहा, उन्हीं की कृपा से आज लगभग 1800 से अधिक दिगम्बर साधु चारित्र पथ के अनुगामी बनकर यत्र-तत्र-सर्वत्र मंगल विहार करते हुए दिखाई दे रहे है।

 

आचार्य श्री के अक्षुण्ण परम्परा में आचार्य श्री वीर सागर जी महाराज आचार्य श्री शिवसागर जी महाराज आचार्य श्रीधर्मसागर जी महाराज आचार्य श्री श्रेयांस सागर जी महाराज, आचार्य श्री अभिनन्दन सागर जी महाराज हुए है। तथा वर्तमान में पंचम पट्टाचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज व सप्तम पट्टाचार्य श्री अनेकान्त सागर जी महाराज चतुर्विद संघ का संचालन करते हुए जिन धर्म की प्रभावना कर रहे हैं।

 

आज सबसे प्राचीन दीक्षित गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती नमती माताजी भी इसी परम्परा में हैं, और परमपूज्य आचार्य विद्यासागर जी महाराज के संपस्थ साधु भी इसी परम्परा के है, जो जिन धर्म की प्रभावना में अलख जगाये हुए हैं।

 

मैं यह बताना भी उचित समझता है कि देश की सर्वोच्च साध्वी गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमति माताजी के प्रेरणा व आशीर्वाद से शाश्वत तीर्थक्षेत्र सम्मेद शिखरजी में आचार्य श्री के नाम से शान्तिसागर धाम का निर्माण कराया जहां सम्मेद शिखर जी से सर्वप्रथम द्वितीय तीर्थकर भगवान अजितनाथ जी मोक्ष गये उनकी 31 फीट ऊंची प्रतिमा विराजमान करवाई जो जन-जन को अहिंसा करे सन्देश दे रही है। जो सम्मेद शिखर जी जाता है उस अतिशयकारी प्रतिमा के दर्शन कर पुण्यार्जन प्राप्त करता है। पूज्य माताजी सदैव आचार्य श्री के उपकारों को समाज के बीच में सदैव गुण-गान करती रहती है। पूज्य माताजी के प्रेरणा में आचार्य श्री के जीवन पर आधारित संगोष्ठी, प्रदर्शन , नाटिका, चित्रकला प्रदर्शनी, भाषण, प्रतियोगिता, निबन्ध प्रतियोगिता आदि आयोजित होती है। उन्ही की प्रेरणा से प्रतिवर्ष आचार्यश्री का समाधि दिवस सम्पूर्ण देश बनाता है।

 

पूज्य माताजी ने ‘शान्ति सागर वर्ष मनाया आचार्य पदारोहण शताब्दी वर्ष मनाया।

इसी क्रम में वर्तमान में आचार्य श्री वात्सल्य वारिधि वर्धमान सागर जी महाराज की प्रेरणा से आचार्य पदारोहण वर्ष का समापन टॉक में चल रहा है। इम समापन के अवसर पर प्रथम कार्यक्रम ‘शान्ति समागम गोष्टी 27 जुलाई को बड़े ही धूम-धाम साह के साथ देश के विभिन्न प्रान्तों से आये पत्रकारों की उपस्थिति में सफलता के साथ सम्पन्न हुई। जिसमें जैन पत्रकार महासंघ की पूर्ण सहभागिता रही। 

इस अवसर पर संघस्थ ऐलक श्री विशाल सागर की मुनि दीक्षा और तत्पश्चात समाधी मरण हुआ आचार्य श्री वर्धमान सागरजी महाराज के सम्बोधन के साथ समाधी पूज्य श्री वर्धमान सागरजी के कर कमलों से सम्पन्न हुई।

बन्धुओं ,आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज का समाधि दिवस भाद्र शुक्ल दोज 25 अगस्त को बड़े ही धूम-धाम से विभिन्न धार्मिक सामाजिक आयोजनों के साथ सम्पन्न करना है। 

इन्हीं शुभ मंगल कामनाओं के साथ।जयवीर ,जय शांतिसागर महामुनि महाराज , जय भारत।

उदयभान जैन बड़जात्या 

मोः 94143-06696

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