मूर्छा भाव व्यक्ति को नियम संयम से दूर करता है आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज

धर्म

मूर्छा भाव व्यक्ति को नियम संयम से दूर करता है आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज
रामगंजमंडी
परम पूज्य आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए गति के विषय में प्रकाश डाला सबसे अच्छी गति मनुष्य गति को बताया महाराज श्री ने बुजुर्ग व्यक्तियों के विषय में कहा कि आप लोग 60 65 की उम्र के हो गए अभी भी दुकान आदि पर जाने का मोह है। आपके मन में है पुरानी दुकान है ग्राहक हमें ही जानता बेटे को नहीं जानता बेटे को अवसर दे दो की ग्राहक उसे जानने लग जाए मूर्छा नहीं छुटती मै जाउंगा तो दुकान चलेगी। नहीं जाऊंगा तो नहीं चलेगी। यही मूर्छा भाव व्यक्ति को व्रत नियम संयम से दूर करता है।

 

 

 

अब यह स्थिति आने लगी है बेटे भी पिताजी से कहने लगे हैं आपको धर्म ध्यान करना चाहिए। बेटे समझदार हो गए पिता नासमझ हो गए। बेटे भी यह कहने लगे आप मंदिर जाओ स्वाध्याय करो उन्होंने कहा चिंतन करो मनन करो साधुओं के पास जाओ सही कार्य करने की सलाह देने वाले व्यक्ति भी हैं तब भी दिमाग में नहीं बैठती।अब नही संभलोगे तो खाट पर आकर तो नहीं संभल सकते डॉक्टर इंजेक्शन बोतल लगाएगा दवाई देगा अंत में कह देगा दुआ दवा कुछ नहीं आई एम सॉरी क्या फायदा है मनुष्य पर्याय मिली है मनुष्य गति मिली है तो इससे जितने लाभ मिल सके लेना चाहिए। मनुष्य पर्याय हमें मिली है तो हमें एक एक क्षण की वसूली करना चाहिए। पहले नहीं कर पाए हो तो जितना समय बचा है जितने वर्ष बचे हैं उस मेहनत का परिश्रम का फल प्राप्त कर लो जिससे आप मनुष्य हुए हो।

उन्होंने कहा फुटपाथ बैठे लोगों को देखकर लगता है मैं बहुत अच्छा हु लोग खाने को तरस रहे हैं लोग लड़ रहे हैं यह सब सहज नहीं है यह सब किए हुए कर्मों का फल है। मनुष्य गति मनुष्य आयु तो बांध ली उसके बाद दुष्कर्म में लग गए आज प्रैक्टिकल में देखिए ऐसी भी मनुष्य गति है कि लोग सड़कों पर हैं भीख मांग रहे हैं और एक मनुष्य गति ऐसी है जिसमें आप रह रहे हैं। घर तो है दाल रोटी तो ठीक से खा रहे हैं। परिवार के बीच में है मंदिर जा रहे हैं। आपको समझ आएगा आपका परिश्रम कैसा था की आप व्यवस्थित मनुष्य हुए। उनके परिश्रम कितना अव्यवस्थित था कि वह फुटपाथ पर हुए। हमें अपने अंदर झांक कर तो देखना ही चाहिए। बड़ी मुश्किल में अवसर मिला है दिखा लो जितने कर्तव्य दिखाना है। अच्छे भी दिखा सकते हो और बुरे भी दिखा सकते हो। बड़ी मुश्किल में अवसर मिला है तुम्हें मनुष्य होने का। आगे भी मनुष्य हो सकते हो। सब तुम्हारे हाथ में है किसी के हाथ में नहीं है। सब कुछ तुम्हारे हाथ में है इस मनुष्य गति का सदुपयोग कर ले सही विचार सही भावना बना ले और स्वर्ग पहुंच जाए फिर मनुष्य गति में आए अपना मार्ग प्रशस्त कर ले। समझदार हो लेकिन अपने आप को नहीं भाप पा रहे हो यह करने से हमारी मनुष्य गति व्यर्थ हो रही है और यह करने से हमारी मनुष्य गति सार्थक हो जाएगी।

उन्होंने कहा मनु की संतान को मनुष्य कहा जाता है इसका अर्थ कुलकर होते हैं। नाभिराय कुलकर थे और उन्होंने भगवान आदिनाथ को जन्म दिया। मनुष्य गति में मनुष्यों को मनु की संतान कहा जाता है।

मनुष्य होने का भी कारण है यह सहज नहीं है। कर्म ही विधाता है यह हमें एक गति से दूसरी गति में ले जा रहे हैं। कर्म न्याय रूपी है। जैसा करते हैं वैसा ही मिलता है। जैसा जीव करता है वैसा ही न्याय जीव को मिलता है। हमने जो कर्म किए हैं या जो कर्म कमाए हैं उसे भोगना ही होगा लोग ज्योतिष के पास जा रहे हैं ज्योतिष कुछ करेगा नहीं। जो आपने किया है भोगना तो पड़ेगा ही और वही गति आपको मिलती है। अपने मूर्छा आस्था अल्प आरंभ परिग्रह को कम किया इसलिए आप मनुष्य हैं। स्वभाव की सरलता होगी तो आपको मनुष्य आयु का बंध होगा।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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