धर्म और आत्मा का बंधन हो यही रक्षाबंधन है।

धर्म

धर्म और आत्मा का बंधन हो यही रक्षाबंधन है। रामगंजमंडी  परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने रक्षाबंधन महोत्सव एवम श्रेयांसनाथ भगवान के मोक्ष कल्याणक महोत्सव के अवसर पर बोलते हुए कहा की दिगम्बरत्व का सही परिचय निष्प्रहता से आता है इसका अर्थ होता है किसी प्रकार की चाह न होना अगर दिगम्बरत्व में चाह है तो दिगम्बरत्व की पूर्ति ही नहीं है। ख्याति लाभ इसे कमजोर कर देगी। 

 

 

 

 उन्होंने कहा जीवन में नया तो कुछ करना चाहिए आज रक्षा बंधन है रक्षा ही करना चाहते हो तो आज व्यक्ति को आत्म रक्षा की जरूरत है। उन्होंने कहा मुझे लगता है धर्म और आत्मा का बंधन यही रक्षाबंधन है। जो छोटा सा धागा बंध रहा है सूत्र बंध रहा है उस समय आत्मा धर्म से बंधनी चाहिए। और आत्मा सही ढंग से बंधती है तो आपने सही तरीके से रक्षाबंधन मनाया। समर्पण की कोई परिभाषा नहीं होती उसकी कोई सीमा नहीं होती है। समर्पण कहने में नहीं आता समर्पण दिखता है। उन्होंने कहा जैन दर्शन कहता है कि आप यदि व्यक्तित्व विशेष पर झुकते हैं तो आपकी आस्था कमजोर है। बनावटी है। दिगम्बरत्व पर झुकते हैं तो तुम्हारी आस्था मजबूत है वास्तविक है।

 

दिगम्बरत्व की साधना है की जहां पंचम काल में सब कुछ नहीं हो सकता फिर भी सब कुछ कर रहे हैं साधना कर रहे हैं। 

 

रक्षा बंधन पर्व निमित्त से स्थापित हुआ है। विष्णु कुमार मुनि ने अपनी आत्मा को धर्म से जोड़ा जब हमारी आत्मा धर्म से जुड़ जाती है सारे विकल्प किनारे हो जाते हैं। फिर समर्पण ही समर्पण होता है और कुछ नहीं होता है आज भी पंचम काल में बलि विष्णुकुमार मुनि है वे दिगम्बरत्व की ऐसे रक्षा कर लेते है की किसी को अहसास ही नहीं होता है की उपसर्ग भी हुआ है। उन्होंने कहा आज रक्षा सूत्र बांधो तो अपने आप को धर्म से भी बांधना। सूत्र बांधा आप अगर धर्म से नहीं बंधे कोई लाभ नहीं धर्म को समझना गहराई में उतर जाना धर्म में डुबो देना धर्मात्मा का मतलब होता है अंदर में धर्म चल जाए आत्मा को कुछ देर के लिए अकेला छोड़ो सारे विकल्पों को विराम देने की कोशिश करो चिंतन की कुशलता व्यक्ति को धर्मात्मा बनाती है। चिंतन शक्ति दुष्परिणाम संकलेश समाप्त कर देती है। कोशिश करो लोग तुम्हारी भी पूजा करे

यह भाव हमेशा आत्मा रखना कि मेरा संपूर्ण समर्पण मुनिराजो के प्रति है समर्पण का अर्थ बताते हुए गुरुदेव ने कहा मैं हर पहलू से आपका हु। दुनिया में जितनी भी अपेक्षाएं हैं उन अपेक्षाओं में सबसे ज्यादा आप हैं। मेरी कैसी भी परिस्थिति हो मैं आपकी परिस्थिति नहीं बिगड़ने दूंगा। यह समर्पण है। उन्होंने कहा आत्मा को अकेला छोड़ने का प्रयास करे कोई भी क्षण ऐसा नहीं रहा जब हम आत्मा को अकेला छोड सके। कोई न कोई विकल्प लेकर हम चलते हैं। कोई न कोई चंचलता हमारी आत्मा में बनी रहती है। सिद्धियों को आत्मा का अकेलापन चाहिए। जब वह निर्विकल्प होती है तो अनेक प्रकार की पोदगलिक ऊर्जा अपनी और खींचती है। व्यक्ति पोदगलिक ऊर्जा को अपनी और आकर्षित करता है। कोई हाथों से, कोई ओजारो से,कोई लेब में प्रैक्टिकल रूप में प्राप्त करता है। इसी के साथ कोई भक्ति के द्वारा और कोई साधना के द्वारा प्राप्त करता है।

आत्मा अगर शांत रहती है तो इनका आमंत्रण कर लेती है। और वह सिद्धियां हो जाती हैं। रिद्धियां सिद्धियां चाह कर सिद्ध नहीं करनी चाहिए उन्होंने कहा अपनी सारी ऊर्जा को आत्म सिद्धी में लगा दो।

     रक्षाबंधन पर्व के अवसर पर अभिषेक पूजन कर श्रेयांसनाथ भगवान के मोक्ष कल्याणक अवसर पर आचार्य श्री के सानिध्य में निर्वाण लाडू समर्पित किया गया। नगर में गुरुदेव संघ को आहार देने के लिए भक्तों में उमंग एवम अपार उत्साह देखा गया ऐसा नगर में प्रथम बार देखा गया जब समस्त संघ एक साथ आहार को निकले समस्त नगर का वातावरण धर्म भक्ति से ओतप्रोत दिखा मानो लगा संपूर्ण नगर आचार्य श्री संघ के चरणों में समर्पित हो। 

     अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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