रक्षाबंधन के पूर्व दिवस आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज संघ सानिध्य में रक्षाबंधन विधान भक्तिभाव के साथ किया गया मंदिर देव शास्त्र गुरु गुणों का खजाना है आचार्य श्री
रामगंजमंडी
परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज संघ सानिध्य मे दो दिवसीय रक्षाबंधन महोत्सव का शुभारंभ हो गया प्रातः बेला में श्री जी के अभिषेक शांति धारा उपरांत प्रवचन सभा पंडाल में भक्तिभाव उल्लास के साथ रक्षाबंधन विधान हुआ जिसे पंडित श्री जयकुमार जैन एवं ब्रह्मचारी नमन भैया ने विधि विधान के साथ संपन्न कराया इस महामंडल विधान में चातुर्मास व्यवस्था समिति की सांस्कृतिक समिति द्वारा आकर्षक मंडल जी के मांडने बनाए जो आकर्षण का केंद्र बिंदु रहे। इसी के साथ सांस्कृतिक समिति के तत्वाधान में हाथों से निर्मित राखियों की प्रदर्शनी भी लगाई गई जो सभी के लिए आकर्षण का केंद्र बिंदु रही।
महामंडल विधान में 700 मुनिराजो के अर्ध समर्पित किए हैं जैन दर्शन में रक्षाबंधन का महत्व इसीलिए है कि इस दिन अकपनाचार्य आदि 700 मुनियों का उपसर्ग दूर हुआ था इसीलिए रक्षाबंधन पर्व मनाया जाता है। महामंडल विधान में सोधर्म इंद्र श्रीमान शांतिलाल मित्तल. कुबेर इंद्र श्रीमान रमेश कुमार जितेंद्र विनायका परिवार ईशान इंद्र प्रदीपकुमार चंदना लुहाड़िया परिवार यज्ञ नायक श्रीमान दिलीप कुमार अरुण विनायका परिवार. सानत इन्द्र हुकमा बाई संतोष देवी अहिंसा टेकनिकल मोड़क वाले माहेन्द्र इंद्र बाबूलाल जैन ट्रेड सेंटर कोटा वाले . ब्रह्म इंद्र श्रीमान जम्बूकुमार हिमांशु मित्तल परिवार ब्रह्मोत्तर इंद्र का सौभाग्य सांस्कृतिक समिति को प्राप्त हुआ। सभी भक्ति से ओतप्रोत रहे।
मंगल प्रवचन देते हुए आचार्य श्री ने कहा नासिका का विषय है सुगंध, हमें सुगंध आती है तो हम नाक को उसी और ले जाते हैं, जब दुर्गंध आती है तो नाक बंद हो जाती है और सारी इन्द्रिया काम करना बंद कर देती है। उन्होंने कहा जिसके भीतर ग्लानि रहित भाव होता है उसे गंदगी से कोई फर्क नहीं पडता इसका मतलब कतई नहीं होता है कि वह गंदगी में जाकर बैठता है। रास्ते से निकल रहा है और गंदगी दुर्गंध आई तो दुखी नहीं होता है संकलेश नहीं करता है। ऐसा व्यक्ति चिंतन करता है कि मेरा शरीर भी तो गंदा है। नो छिद्र शरीर में ऐसे हैं जहां से निरंतर गंदगी रहती है। अपनी गंदगी हमें गंदगी नहीं लगती लेकिन दूसरे की गंदगी हमें गंदगी लगती है। जबकि कोई फर्क नहीं है गंदगी तो गंदगी है। सम्यक दृष्टि जीव के विषय में बताते हुए कहा वह व्यक्ति निरंतर विचार करता है कि मैं अपने मन पर कंट्रोल रखूंगा। मुनियों को देखकर यदि ग्लानि करते है तो हानि सदगतियो में अनंत पर्यायो की हो जाती है।
आप अपने शरीर को कितना घिसोगे की आप गोरे हो जाओगे क्या नहीं आपसे अच्छा तो पत्थर है उसे जितना घिसते घिसते जाओ उसमें कांच दिखने लगता है और उसमें आपका चेहरा नजर आने लगता है। शरीर को आप कितने भी घिसते जाओ काले से गोरे होने वाले नहीं हो। गोरे से और गोरे वाले नहीं हो। नाम कर्म जैसा प्रकट होगा वैसा ही शरीर का वर्ण प्रकट होगा। 
गृहस्थ के विषय में कहा कि गृहस्थ की महिमा लिखी जाए तो बहुत बड़ी है पाप इतने हो जाते है कि वह लिख ही नहीं पाएगा। दिगंबर साधु के शरीर को नहीं गुणों को देखा जाता है। घर में जितना भी आवरण होता है अवगुण देने वाला होता है। मंदिर जिनालय में गुण मिलने वाले होते है। आप देखना जिनालय की आयतन की किसी भी दीवार को यदि हम देखेंगे यदि आपकी दृष्टि धार्मिक है तो उस दीवार से आपको गुण ही टपकते दिखाई देंगे। इस आयतन में जिस भी हिस्से को आप स्पर्श करते हैं आपको अच्छा ही मिलेगा अच्छा ही प्राप्त होगा अच्छी वर्गणा मिलेगी वह आपको धार्मिक बनाएगी और अच्छा बनाएगी। मंदिर देव शास्त्र गुरु गुणों का खजाना है।
मुनिराज जीवंत है मंदिर जीवंत नहीं है। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन कहता है कि आपको अपने गुण चाहिए मुनिराज के गुण नहीं एक उदाहरण के माध्यम से बताया कि आईना में चेहरा देखते हो तो आईने का चेहरा नहीं देखते हो आप अपना चेहरा देखते हो।
जैन दर्शन कहता है कि आपको अपने गुण चाहिए इसीलिए देव शास्त्र गुरु का आलंबन लिया जाता है सेवा की जाती है वात्सल्य किया जाता है यह गुण हमारे अंदर आए गुणीजनों को देख हृदय में प्रेम का अर्थ है निस्वार्थ वात्सल्य उन्होंने कहा आप 700 मुनिराजो के अर्ध इस भाव से चढ़ाना की मुनिराज के शरीर पर दुर्गंध आदि भी हो मै ग्लानि नहीं करूंगा। समर्पित करना पुण्य का अंबार लग जाएगा।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312
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