समाधिस्थ मुनि श्री विशाल सागर जी को आचार्य श्री वर्धमान सागर जी सहित अनेक साधुओं ने भावांजलि प्रस्तुत की।श्री विशाल सागर जी में साधु आहार दान सेवा भाव पूर्वजों से संस्कार में प्राप्त आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

टोंक आचार्य श्री धर्मसागर जी से दीक्षित नगर गौरव मुनि श्री निर्मल सागर जी की जन्म नगरी टोंक आचार्य श्री वर्धमानसागर जी के चातुर्मास से धर्म की राजधानी होती जा रही है ।पूर्व से भगवान श्री आदिनाथ सहित अनेक भगवान की प्रतिमाएं भूगर्भ से निकलने के कारण जैन समाज टोंक को अतिशय क्षेत्र माना जाता है। प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की परंपरा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधी आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संयम साधना का 57 वा वर्षायोग36 वर्ष के आचार्य पद के बाद टोंकनगर में पहली बार कर रहे हैं।कार्यक्रम संचालक श्री कमल सराफ अनुसार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने कल क्षुल्लक श्री विशाल सागर जी को मुनि दीक्षा देकर मुनि श्री विशालसागर नामकरण किया ।दीक्षा के कुछ समय बाद ही उनकी सम्यकसमाधि आचार्यश्री सानिध्य में णमोकार मंत्र ,अरिहंत सिद्ध श्रवण करते हुए हुई। 27 जुलाई को ही उनका विधिविधान से संघ सानिध्य में अंतिम संस्कार हुए।चातुर्मास समिति एवं दिगम्बर जैन समाज द्वारा आयोजित विनयांजलि सभा में अनेक श्रावकों ने श्रद्धा सुमन शब्दों द्वारा प्रगट किए।
राजेश पंचोलिया के अनुसार धर्म सभा दीक्षा गुरु आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रवचन में बताया कि संसारी प्राणी का जन्म मरण निश्चित है। रोगी बीमार होने पर आप चिकित्सालय में भर्ती होते है गंभीर रोगी को i c u गहन चिकित्सा कक्ष ओर वेंटिलेटर पर रखा जाता है। विरले भव्य प्राणी संसार की नश्वरता को समझ कर गुरु शरण में आकर दीक्षा धारण करते हैं।ओर धर्म धारण कर समाधिमरण करते हैं मुनि श्री विशाल सागर जी को अपने दादा दादी से धार्मिक संस्कार विरासत में मिले। इसी कारण आचार्य संघ में जाकर चौका लगाना,साधुओं की सेवा करना आदि धार्मिक कार्य करते थे।उनकी कई वर्षों से मुनि दीक्षा लेने की भावना थी किंतु संयोग टोंक नगर में बना यहां उनकी मुनि दीक्षा हुई और कुछ ही समय बाद उनकी समाधि भी हो गई। उनमें शारीरिक अस्वस्थता थीं ,किंतु मानसिक रूप से वे काफी बलशाली रहे।उन्होंने स्वयं खुद के केश लोचन किए । संकट में उनकी दृढ़ता से दीक्षा आसान हो गई।उनका पुण्य काफी प्रबल रहा। आचार्य श्री की भावांजलि के पूर्व श्रावकों ने शब्द विनयांजलि दी।आर्यिका श्री प्रणत मति,श्री देशना मति,श्री दर्शानामति,श्री विन्रम मति, श्री पूर्णिमामति,श्री विलोक मति ,श्री वत्सल मति,श्री चैत्यमति,ने श्री विशाल सागर जी की नम्रता विनय गुण की प्रशंसा की।गृहस्थ अवस्था की पत्नी आर्यिका श्री विचक्षण मति माताजी ने गृहस्थ अवस्था ओर साधु जीवन के गुणों बाबद बताया कि दीक्षा के पूर्व उन्होंने भगवान के माता पिता सौधर्म इंद्र,राजा श्रेयांस आदि अनेक बार पंच कल्याणक और बड़े विधान में बने।व्यापार में भी उनकी निस्पृहता रहती थी।आप ने पिता की समाधि कराई। उनके साथ मैने भी वर्ष 2015 में दीक्षा ली उन्होंने सासू मां और स्वयं की माता को भी आर्यिका दीक्षा लेने को प्रेरित किया ।आर्यिका श्री शुभ मति माताजी ने उनके द्वारा साधुओं जीवन में किए हजारों उपवास का उल्लेख किया। धर्म सभा में मुनि श्री प्रणीत सागर जी ,श्री मुमुक्षु सागर ,श्री प्रबुद्ध सागर ,श्री चिंतन सागर,श्री प्रभव सागर जी ने भावांजलि प्रस्तुत की मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने उनकेसंघ,साधुओं के प्रति सेवा भाव,तीर्थ प्रेमी,तपस्वी, दानी आदि गुणों की भूरी भूरी हृदय से प्रशंसा कर शीघ्र देव पर्याय के बाद मनुष्य भव में संयम दीक्षा धारण कर सिद्ध अवस्था की कामना की आपने दिगंबर साधुओं के लिए पृथक समाधि स्थल निर्मित करने की प्रेरणा दी। आर्यिका 105 देशनामति माताजी के भी केशलोच हुए

राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
