ध्यान का मतलब किसी एक विषय पर एकाग्र होना विनिश्चय सागर महाराज
रामगंजमंडी सोमवार की प्रातः बेला में श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर परिसर धर्मसभा का शुभारंभ मंगलाचरण से हुआ मंगलाचरण श्रीमती सुधा डूंगरवाल ने किया। धर्म सभा का संचालन श्री राजकुमार गंगवाल ने किया।
परम पूज्य वाककेसरी आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने ध्यान के विषय में प्रकाश डाला आचार्य श्री ने ध्यान का मतलब समझाते हुए कहा कि ध्यान का मतलब किसी एक विषय में एकाग्र होना ध्यान है। मन की एकाग्रता से ही ध्यान प्रारंभ होता है ध्यान में सबसे बड़ी समस्या मन का दोष है लेकिन यह दोष मन का नहीं हमारा है। क्योंकि हमने मन को स्वतंत्रता इतनी दे रखी है कि हम कंट्रोल नहीं कर रहे हैं।

इंद्रिय विषयों में हम आसक्त हैं इसलिए बार-बार मन उस पर जाता है। संपूर्ण समस्या की जड़ मन है। यदि हमारी इच्छा शक्ति को दृढ़ कर ले तो तो यह संभव है। हमारी इच्छा शक्ति कमजोर होती है मन में दृढ़ता नहीं होती है तो मन चंचल होता जाता है। मन को कंट्रोल करना चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा कि मन वचन काया इन तीनों चीजों पर कंट्रोल करना ध्यान है इन पर कंट्रोल करें थोड़ी तकलीफ परिषह सह कर हम कंट्रोल कर सकते हैं हम मन में विकल्प बना लेते हैं और समय इस विषय वस्तु में निकल जाता है।
उन्होंने मोबाइल के विषय में कहा कि मोबाइल आने पर 100% मन चंचल होता जा रहा है जो जानने योग्य नहीं है वह विकल्प जाने लगते हैं मन के विकल्प का विच्छेद समाप्त करना ध्यान है। मन को विश्वास में लेना ध्यान है। मन इंद्रिय की सुन लेता है लेकिन आत्मा की नहीं सुनता।
ध्यान सुकुन का कारण है सुकून ध्यान से ही प्राप्त होता है। यह लोगों की भ्रांति है कि पर पदार्थ में आसक्ति है तो सुकून मिलता है। जिस समय आसक्ति आती है उस समय त्याग कर दो ।जब तक आसक्ति नहीं जाएगी तब तक मन पर कंट्रोल नहीं कर सकते। हमें अनासक्ति का भाव बनाना पड़ेगा। सबको सुकुन चाहिए सुकून आपको खुद को जागृत करना है। ध्यान की भूमिका प्रत्येक व्यक्ति को बनाना चाहिए।
उन्होंने कहा रोगों का कारण शरीर नहीं हमारी मानसिकता है मस्तिष्क की भी एक सीमा है आप मन में विकल्प लेते जा रहे हैं। इसीलिए आप रोगों से ग्रसित हो रहे हैं। दिमाग खजाना है आपने इसे कबाड़खाना बना रखा है मानसिकता यदि खराब होगी तो मन एकाग्र नहीं हो सकता और वह ध्यान नहीं कर सकता और सुकून दिमाग में नहीं फैलता है।
तीन रोग सबसे ज्यादा हैं मानसिक, हार्ट और शुगर हमारी मानसिकता हमने ही खराब कर रखी है उन्होंने कहा तुम ही तुम्हारी मानसिकता के वैद्य हो। जब तक दिमाग की गंदगी नहीं निकालेगे अच्छाई नहीं आएगी। हमारी मानसिकता अमूल्य है इसका कोई मूल्य नहीं है। मानसिकता का ध्यान नहीं रख रहे हैं कबाड़खाना बना रहे हैं ध्यान मानसिकता का विराम है। दुनिया में सबसे ज्यादा जरूरत ध्यान की है यदि ध्यान करना आ जाएगा तो आपको दवा की जरूरत नहीं होगी आपकी मानसिकता निश्चित ध्यान में होगी। संपूर्ण लाभ देने वाला भी मन है और अनर्थ की ओर ले जाने वाला भी मन है मन जड़ है जिधर मुड़ जाओ उधर मुड़ जाएगा।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312







