मन वाणी और व्यवहार में सत्य को प्रतिष्ठापित करना ही सत्याचरण है प्रमाण सागर महाराज
भोपाल
“सत्य को केवल अनुभव किया जा सकता है,और उस अनुभव स्वरुप सत्य को पाने के लिये आचरण के बल पर ही समझा जा सकता है” उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने शंकासमाधान कार्यक्रम के अन्तर्गत एक प्रश्न के उत्तर में व्यक्त किये उन्होंने कहा कि मन वाणी और व्यवहार में सत्य को प्रतिष्ठापित करना ही सत्याचरण है।इस अर्थ में मन में निर्मलता वचनों में सत्यता तथा व्यवहार में प्रामणिकता होना आवश्यक है।
मुनि श्री ने कहा कि इच्छाओं और विकारों को जीत लेता है वही तो जैन है उन्होंने कहा कि आत्मा तो हमेशा से शुद्ध है विकारों के कारण आत्मा अशुद्ध होती है। अपने अंतरमन में आत्मा को विकसित करना चाहते है तो आत्मा को बाहरी संपर्कों से दूर रखना होगा तभी हमारी आत्मा विशुद्ध होगी।




हमारी आत्मा का ध्येय चित्त की विशुद्धी का होना चाहिये। अहिंसा का पालन जीवों के वधावध तक सीमित नहीं है अहिंसा का संबंध हमारे भावों से है जैन धर्म में दृव्य हिंसा और भाव हिंसा के रूप में बांटा गया है। किसी को मारा वह दृव्य हिंसा है तथा मारने के भाव किये लेकिन मारा नहीं यह भाव हिंसा है। प्रश्न किया गया आज हर व्यक्ति के मुख पर मुस्कान है,लेकिन मन अंदर से अशांत है” जबकि गुरुदेव वर्तमान समय में जिनवाणी का इतना अधिक प्रचार प्रसार है? उसका उत्तर देते हुये मुनि श्री ने कहा कि प्रवचन कितनी देर सुनते है एक घंटा और 23 घंटा तो वही सब क्रियायें है जितना आप सुनते हो उससे अशांत मन शांत हो जाता है घर घर चर्चा रहे धर्म की जिससे लोगों के हृदय में धर्म प्रतिष्ठापित हो जिससे वह अधर्म से दूर रह सके।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
