ईर्ष्या वह अग्नि है जो स्व पर को जलाकर भस्म कर देती है विशुद्ध सागर महाराज

धर्म

ईर्ष्या वह अग्नि है जो स्व पर को जलाकर भस्म कर देती है विशुद्ध सागर महाराज

उज्जैन
ईर्ष्या वह अग्नि है जो स्व पर को जलाकर भस्म कर देती है। ईर्ष्यालु को गुणियों में भी गुण दिखाई नहीं देते। ईर्ष्यालु दूसरों की उन्नति को देख ही नहीं पाता है। सुखद जीवन जीना है, तो ईर्ष्या परिणाम मत करो और प्रयत्न पूर्वक ईर्ष्यालुओ से अपनी आत्मरक्षा करो।

 

 

यह उद्बोधन आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में दिया आचार्य श्री ने आगे कहा कि जो जैसा करनी करेगा उसे वैसा ही कर्म फल भोगना पड़ेगा। जो घर में चूहे पकड़ने का पिंजरा रखता है। चूहे पकड़कर मार्ग पर छोड़ दिया उसके फल स्वरुप चूहा सड़क पर वाहन से दबकर मर गया दूसरी और बिल में चूहे के बच्चे मां की विरह में तड़प तड़प कर मर गए। इसका फल कोन भोगेगा। अब रोओ मत संतान ही नहीं होगी। तुमने संतान के प्राण लिए अब संतान का जन्म ही नहीं हो रहा है। जैसे कर्म करेंगे, वैसा फल मिलेगा, जैसा पानी पिओगे, वैसी वाणी होगी।

 

 

अच्छे संस्कारों से ही इंसान भगवान बनता है
आचार्य श्री ने कहा कि जो संयमित होकर जीवन जीता है उसी मां के गर्भ में राम व महावीर जैसी संताने आती हैं। संतान के गर्भ में आने के प्रारंभ से ही अच्छे संस्कार देना चाहिए। बचपन के संस्कार ही बड़े होने पर काम आते हैं। संस्कारों से ही इंसान भगवान बनता है। और कुसंस्कारों से इंसान शैतान बनता है।

संस्कारों की रक्षा करोगे तभी संतान की रक्षा होगी मंत्र संस्कार से पाषाण भी प्रतिमा बन जाती है। संस्कार से गेहूं से रोटी व अन्य व्यंजन बन जाते हैं।

आचार्य भगवंत ने कहा कि श्री राम जैसा पुत्र चाहिए तो आपको श्री राम जैसा मर्यादित संयमित आदर्श जीवन जीना पड़ेगा। अज्ञान ही दुख का मूल बीज संसार में संपूर्ण दुखो का मूल कारण एकमात्र अज्ञान परिणाम है। अज्ञान ही भटकाता है, अज्ञान ही रुलाता है। अज्ञान ही चिंता में डालता है। अज्ञान ही दुख देता है, अज्ञान ही कष्ट देता है। यथार्थ ज्ञान होते ही प्रसन्नता प्राप्त हो जाती है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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