शतरंज में वज़ीर और ज़िंन्दगी में ज़मीर..अगर मर जाये तो समझिए खेल ख़त्म..! प्रसन्न सागर महाराज
अन्तर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज की कुलचाराम से बद्रीनाथ अहिंसा संस्कार पदयात्रा चल रही है आज विहार दरम्यान उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि शतरंज में वज़ीर और ज़िंन्दगी में ज़मीर..अगर मर जाये तो समझिये खेल ख़त्म..!
उन्होंने कहा i धरती पर परमात्मा की सबसे सुन्दर कृति मनुष्य है। इस सृष्टि का मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। मनुष्य अपने जीवन को सजाने, संवारने और बनाने के लिये रोज नये-नये प्रयोग और नवाचार करता रहता है। *मनुष्य अपने संसार की उधेड़ बुन में 23 घन्टे लगाये कोई परेशानी नहीं, लेकिन 1 घन्टा आध्यात्मिक जीवन को संवारने सजाने में निकालना चाहिए। आध्यात्मिक विकास से ही हम अपने जीवन की आलौकिक शक्तियों को जान पहचान सकते हैं।

उन्होंने कहा आत्मा की शक्ति अनन्त है, जिसे तलवार काट नहीं सकती, अग्नि जला नहीं सकती, धूप सूखा नहीं सकती, हवा उड़ा नहीं सकती। आत्मा अजर अमर अविनाशी है।

आचार्यों ने कहा है – नमे मृत्यु कुटुर भीतिर।जब आत्मा मरती ही नहीं है तो फिर तुम डरते क्यों हो मौत से-? हमारा स्वार्थ, मोह और लोभ, हमें मौत से डराता है। जैसे दो नंबर का काम करने वाले व्यापारी इनकम टैक्स, सेल्स टैक्स अफसर से डरते हैं। उसी प्रकार जिनके जीवन का हिसाब किताब गड़बड़ होता है, वो मौत और परमात्मा से डरते हैं।

हमारी आत्मा ने कभी भी पाप कार्य को पुण्य कर्म नहीं कहा। गलत कार्य को सही नहीं कहा। ये अलग बात है – हम अपने लोभ और स्वार्थ के कारण चेतना की अवाज को अनसुना कर दें, लेकिन भीतर से जो आवाज आती है वो एकदम सही आती है।
जो लोग चेतना की आवाज को सुनते हैं, चिन्तन करते हैं, दृढ़ता पूर्वक अपने कार्य और कर्तव्य के प्रति अग्रसर हो जाते हैं, वे अपने अतीत को भूलकर आगे बढ़ने लगते हैं और अपने जीवन के उद्देश्य को प्राप्त कर लेते हैं…!!!
नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312




