युद्धों और शांति से मुक्ति पाना है तो अपरिग्रह को अपनाना होगा आचार्य विशुद्ध सागर महाराज
सनावद
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी सहित अनेक संतों की जन्म नगरी सनावद में चर्या शिरोमणि 108 आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी का आगमन अपने 75 शिष्यों के साथ हुआ। भगवान महावीर स्वामी ने संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए अहिंसा,सत्य,
अपरिग्रह,अचौर्य और ब्रम्हचर्य का संदेश दिया है। भगवान महावीर के संदेश पूर्व में भी प्रासंगिक थे।वर्तमान काल में भी सामयिक हैं और भविष्य में भी मानवता का मार्गदर्शन करते रहेंगे।
ये प्रेरक विचार सुविख्यात अध्यात्म योगी एवं शताब्दी देशनाकार आचार्य श्री 108 विशुद्धसागरजी महाराज ने शनिवार को पत्रकार वार्ता में व्यक्त किए।
मुनि भक्त अजय पंचोलिया के प्रयास से आयोजित पत्रकार वार्ता में आचार्य श्री ने सभी पत्रकारो के प्रश्नों का सटीक और शास्त्रोक्त जवाब सरल भाषा में दिये ।
विश्व के विभिन्न हिस्सों में चल रहे युद्धों और नरसंहार के संबंध में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में महाराज जी ने कहा कि भूतकाल में जितने युद्ध हुए हैं और वर्तमान में जो युद्ध हो रहे हैं तथा भविष्य में भी जो युद्ध होंगे।उन सभी युद्ध का प्रमुख कारण मानव की परिग्रह की लालसा है। परिग्रह ही दुःख और अशांति का कारण है। परिग्रह संपूर्ण पापों का मूल है। महाराज जी ने कहा कि यदि युद्धों और अशांति से निजात पाना है तो मानवता को भगवान महावीर के अपरिग्रह के सिद्धांत को अपनाना ही होगा। महाराज जी ने कहा कि हिंसा से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। समस्या के समाधान के लिए वार्ता और शांतिपूर्ण विचार विमर्श आवश्यक है। इसलिए अहिंसा को मूल भाव के स्वरूप में अपनाना होगा। तभी संसार,समाज और परिवार में स्थाई शांति की स्थापना संभव है।

महाराज जी ने सत्संग का महत्व बताते हुए कहा कि सत्संग में सुने गए उपदेश अथवा सात्विक विचार मानव मन पर सकारात्मक प्रभाव अवश्य डालते हैं। इसलिए जब भी अवसर मिले सत्संग में उपस्थित होना चाहिए और तन्मय होकर साधु-संतों के वचनों का श्रवण करना चाहिए। महाराज जी ने भगवान महावीर के संदेशों की सरल शब्दों में व्याख्या करते हुए कहा कि शत्रु को भी शत्रु दृष्टि से मत देखो,उसके अहित में चिंतन मत करो,यही अहिंसा है। मारने वाले से रक्षा करने वाला श्रेष्ठ होता है। सत्य जीवन का सार है।सत्य वचनों से वाणी पवित्र होती है। सत्य की परीक्षा संकटकाल में ही होती है।


किसी व्यक्ति की धरोहर का हरण नहीं करना अचौर्य अथवा अस्तेय है। अचौर्य महान व्रत है और इहलोक और परलोक में यश देने वाला है। ब्रम्हचर्य व्रतों का सम्राट है। ज्ञान,विवेक का विकास ब्रम्हचर्य के पालन से ही संभव है।
अजय पंचोलिया से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

