दूसरों के भरोसे नहीं, स्वयं अपने भाग्य के भरोसे जीवन जीयें। प्रसन्न सागर महाराज
सोमेश्वर
अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा की सत युग पूरा विश्व मेरा परिवार है।त्रेता युग मेरा देश मेरा परिवार है।द्वापर युग मेरा परिवार ही मेरा परिवार है।कलयुग मैं ही मेरा परिवार है।
महाराज श्री ने कहा की अब जिंदगी जीने के मायने बदल गये भाई। जिन्दगी जीना आसान नहीं है। हर हालात के लिए अपने आपको तैयार रखना होगा। मित्र कब दुश्मन बन जाये, अपने कब पराये हो जाये, दवाई कब जहर बन जाये, जहर कब दवाई बन जाये। इसलिए दूसरों के भरोसे नहीं, स्वयं अपने भाग्य के भरोसे जीवन जीयें।

उन्होंने माता पिता अभिवावकों की और ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा की आप अपने बच्चों के भरोसे जीवन नहीं जी सकते। आज के बच्चे मां बाप के बुढ़ापे की लाठी नहीं बल्कि वृद्ध आश्रम की व्यवस्था का एक जरिया है
इसलिए बच्चे चार प्रकार के —
पहला लेनदार बच्चा पिछले जन्म का लेनदार बच्चा। आपके घर में बच्चा बनकर आया है – आप खूब पढ़ाओ, लिखाओ, विवाह करो, कराओ,, वह अपना लेन-देन पूरा करके नो दो ग्यारह हो जायेगा।दूसरा दुश्मन बच्चा पिछले जन्म की आज दुश्मनी निकालेगा, कदम कदम पर अपमान करेगा, दुःख देगा, ना जीयेगा ना जीने देगा।
तीसरा उदासीन बच्चा ऐसा बच्चा ना सुख देता है ना दुःख। कहने को बच्चा है, पर उससे कोई उम्मीद नहीं कर सकते।
चोथा सेवक बच्चा पिछ्ले जन्म में, आपने किसी की सेवा की होगी, वही आपके घर में बच्चा बनकर आया है। ऐसा बच्चा मां बाप के नाम को रोशन करता है, उनका हर दुःख अपना दुःख मानता है और मां बाप के लिये जीता है और उनके लिए ही मरता है।

आप कोन से बच्चे है। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

