40 लाख का बड़ा पैकेज छोड़ अविरल सांसारिक जीवन को छोड़कर बन गए मुनि निसंग सागर
खरगोन
सांसारिक मोह,माया भौतिकता की चकाचौंध एवं भौतिक सुखों को छोड़कर दिल्ली फरीदाबाद के युवक आईआईटीयन अविरल जैन ने 14 नवंबर 2021 को आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर महाराज से दीक्षा लेकर मुनि निसंग सागर बन गए।
खरगोन में आयोजित वेदी प्रतिष्ठा महोत्सव में वे आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज के साथ पधारे थे उन्होंने बताया कि जीवन में हमें हर क्षेत्र में संतुलन बनाना जरूरी है। ताकि हम अपने जीवन में धर्म संस्कारों के साथ तात्कालिक सुखों को भी प्राप्त कर सकें।
महाराज श्री ने वर्तमान युवा पीढ़ी की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कड़ी चिंता व्यक्त की और कहा कि वर्तमान में युवा पीढ़ी भोगों की लहर में भटकती जा रही है जिसे हमें संजोकर रखना है। उन्होंने कहा वर्तमान में मनुष्य शून्य की दौड़ में लगा है यह दौड़ खत्म होने की बजाय बढ़ती ही जा रही है। इस दौड़ में दौड़ते हुए मनुष्य खुद ही बाहर हो जाता है इसलिए हमें भगवान की भक्ति करते रहना चाहिए।
महाराज श्री का विवरण

आपको बता दें शाश्वत तीर्थ सम्मेद शिखर में आयोजित जैनेश्वरी मुनि दीक्षा समारोह में आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर महाराज ने इन्हें दीक्षा प्रदान की थी। विशुद्ध सागर महाराज से प्रभावित होकर उन्होंने मुनि बनकर मोक्ष प्राप्ति का मार्ग चुना है। इन्होंने वर्ष 2015 में शैक्षणिक अध्ययन करते हुए आईआईटी वाराणसी से कंप्यूटर साइंस में पढ़ाई पुरी की थी। एवं इसके बाद वे वर्ष 2015 में ही बेंगलुरु में गोल्डमैन एसएसीएचएस कंपनी में नौकरी ज्वाइन की उनका 40 लख रुपए सालाना पैकेज चल रहा था।
लेकिन समय को कुछ और मंजूर था जीवन शानदार चल रहा था न्यूयॉर्क समेत विदेश का भी भ्रमण किया था फुटबॉल खेलना और बाइक चलाना इन्हें पसंद था। लेकिन वर्ष 2018 में बेंगलुरु में जब आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज के इन्होंने दर्शन किए। उस समय वहां पर आदित्य सागर महाराज का चातुर्मास भी चल रहा था। श्री अविरल जैन आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज के दर्शन करते ही तय कर लिया कि अब संसार की दौड़ में अपना जीवन खराब नहीं करना है। सन्यासी बनना है। इस फैसले का पहले घर वालों ने विरोध किया। लेकिन उन्होंने घर वालों को समझाया कि जीवन का रास्ता यही है, जो वह चुन रहे हैं। इसके बाद घरवाले भी मान गए।
अविरल फरवरी 2019 में नौकरी छोड़ विशुद्ध सागर महाराज के शिष्य बन गए। जैन मुनि बनने के लिए उन्होंने 3 साल तक तपस्या की।
घर से ही शुरू होती है संस्कार की पाठशाला मुनि श्री
इस मोबाइल की युग में जहां समय तेज गति से अग्रसर हो रहा है, हम अपने धर्म संस्कृति और संस्कारों को पीछे छोड़ने जा रहे हैं। मुनि श्री ने कहा कि वर्तमान पीढ़ी संस्कारों से दूर होती जा रही है बच्चों को संस्कारवान बनाने के लिए हमें घर से ही इसकी शुरुआत करनी चाहिए।
हमें घरों में ही संस्कारों की पाठशाला लगानी चाहिए। महाराज श्री ने बताया कि भगवान की भक्ति से जीवन में उम्मीद से ज्यादा मिलता है। महाराज श्री अपने बचपन की बात को बताते हुए कहते हैं कि उन्हें बचपन से ही भगवान में लगाव था। वे जहां भी रहे उन्होंने कभी भगवान को नहीं छोड़ा। वे पढ़ाई के साथ ही करीब आधे से एक घंटा मंदिर में पूजन अभिषेक करते थे। जिसका परिणाम है कि वह पूरी तरह से भगवान को ही समर्पित हो चुके हैं। इस संसार में ऐसा कोई सुख नहीं है जो भगवान की भक्ति से प्राप्त नहीं किया जा सकता।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312



