मुनि पुंगव श्री सुधा सागर महाराज ने भगवान शान्तिनाथ की प्रतिमा साथ नवीन प्रतिमा का किया मंत्रंन्यासजिस दिन पुण्य की गागर भर जायेगी तुम भगवान बन जाओगे –मुनि पुंगव श्रीसुधासागरजी महाराज
बहोरीबंद
पाप का घड़ा तो भरता है लेकिन पुण्य का घड़ा भरता नहीं, जिस दिन पुण्य की गागर भर जायेगी, उस दिन तुम भगवान बन जाओगे पुण्य का फल अरिहन्त पद में परिवर्तित हो जाता है। गृहस्थों के षटकर्म पुण्य के घड़े को भरने के लिए बताये गए है गृहस्थ यदि इन षट आवश्यको का पालन करते हुए मोक्ष मार्ग पर बढ़ता चला जाता है तो वह दिन दूर नहीं जब बह परम पावन पद को प्राप्त कर लें जीवन का उद्देश्य भी यही होना चाहिए उक्त आश्य केउद्गार श्री चमत्कारोदय तीर्थ बहोरीबंद में भगवान श्रीशांतिनाथ स्वामी पर मंत्रंन्यास करते हुए मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महाराज ने व्यक्त किए
तीर्थ पर देवाधिदेव भगवान श्री शांतिनाथ स्वामी को दिव्य आसन पर विराजमान करने का सौभाग्य जाने माने उद्योगपति श्री सौभाग्यमल राजेन्द्र कुमार कटारिया परिवार को मिला वही नवीन प्रतिमा को स्थापित करने का सौभाग्य उत्तम चंद अनुराग कुमार अनुज कुमार कोयला परिवार को मिला इस परिवार ने वर्षो पूर्व आचार्य भगवंत गुरुवर श्री विद्यासागर जी महाराज से प्रभु को दिव्य आसन पर विराजमान करने का आशीर्वाद प्राप्त किया था और आज परमपूज्य मुनि पुंगव श्रीसुधासागरजी महाराज जब मंत्रंन्यास कर रहे थे तब अनुराग भाई की आंखें भर आईं वो एक स्वप्न को साकार होते देख रहे थे कोयला परिवार को ही चेतनोदय तीर्थ कटनी के मूलनायक मन्दिर को बनाने का सौभाग्य गुरुदेव के आशीर्वाद से प्राप्त हुआ था।

जब तक साधन के रूप में धन रहेगा हितकारी होगा
मुनि पुंगव ने कहा कि जब तक साधन के रूप में धन रहेगा वह अहितकारी नहीं होगा लेकिन धन साध्य बन जाता है। धन साधन है, धर्म साध्य है लेकिन लोग धर्म को साधन बना रहे है, धन को साध्य इसलिए वह धन पतन का कारण बन जाता है, रावण ने भी यही तो किया गुरु और भगवान के लिए विवाह का आमंत्रण पत्र दो दृष्टि से रखा जाता है- एक आराधना की दृष्टि से क्योंकि वह महान है, आराधना के योग्य है। दूसरा मंगल और शुगन के रूप में, इष्ट देव व कुल देवता के रूप में तब वह कुल के एक अंग होते है, कुल के एक वटवृक्ष के समान रक्षक होते है।
इसी प्रकार आराध्य व कुल गुरु होते है, जिसे इष्ट गुरु कहते है, वे कुल के एक अंग होते हैं, अंग होने के नाते उनका आशीष होता है भक्त को एहसास होता है कि ये आये है, तभी वह इन्हें निमंत्रण कार्ड देता है। बस आने के तरीके अलग अलग होते है, कुछ लोग स्वयं आ जाते हैं, कुछ लोगों की वर्गणाये आ जाती है, कुछ लोगों का नाम ही मंगल है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312










