भावों की निर्मलता पूर्वक की गई पूजन गुरु भक्ति से आत्मा से कर्म दूर होते हैआचार्य श्री वर्धमान सागर जी

धर्म

भावों की निर्मलता पूर्वक की गई पूजन गुरु भक्ति से आत्मा से कर्म दूर होते हैआचार्य श्री वर्धमान सागर जी

धारियावद

प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की परंपरा के द्वितीय पट्टाधीश आचार्य श्री शिवसागर जी महाराज का 57 वा अंतरविलय समाधि वर्ष तथा आचार्यकल्प श्री श्रुतसागर जी महाराज का अवतरण दिवस पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी सहित 52 साधुओं के सानिध्य में धरियाबाद में भक्ति भावपूर्वक मनाया गया।दोनों आचार्य की पूजन संगीत सहित मुनि श्री हितेंद्र सागर जी एवं आर्यिका श्री महायशमति जी ने संपन्न कराई। 57 प्रकार के विभिन्न द्रव्य जिसमें सभी प्रकार के फल,मिठाई मोदक,पुष्प ,सूखे मेवे, से संघ के गज्जू भैया,वीणा दीदी, राजेशभैया मेड़ता सिटी ,विकास भैया सुरेश शाह पंडित हंसमुख शास्त्री बाहर से पधारे शिखरचंद घाटलिया सहित बाहर के एवं स्थानीय भक्तों ने नृत्य एवं भक्ति पूर्वक अर्घ्य समर्पित किए। आचार्य श्री ने धर्म उपदेश में बताया कि संसारी प्राणी दुख से घबराते हैं सुख चाहते हैं किंतु कर्म सिद्धांत के आधार पर ही जन्म और मरण लगा रहता है lआचार्य श्री शिव सागर जी महाराज का समाधि दिवस तथा आचार्य कल्प श्री श्रुतसागर जी महाराज का जन्म दिवस पर आयोजित धर्म सभा में गुणानुवाद किया ।राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री ने बताया कि संसार में दुख है मोह ममता में सुख खोजते हैं किंतु बिरले प्राणी दुख को समझ कर आध्यात्मिक सुख प्राप्त करने के लिए सन्यास धारण करते हैं।श्री श्रुत सागर जी महाराज ने गृहस्थ अवस्था में सम्मेद शिखर की यात्रा में पारसनाथ टोंक पर यही लिखकर कामना कि ,की मेरा सर्वनाश हो जाए उनके लिखने का आशय यही था कि मैं जन्म मरण संसार के कष्ट से दूर होकर दुख से छुटकारा पा सकूं।लोग कहते है कि दीक्षा में कष्ट होता है,संसार तथा तीर्थ यात्रा में भी कष्ट दुख होता हैं तो भी आप रहते है।आचार्य श्री शिव सागर जी हमेशा गुरु के साथ रहे गुरुओं की भक्ति पूर्ण पूजन श्रावको का कर्तव्य है, भावो की निर्मलता से की गई पूजन से आत्मा पर लगे कर्म दूर होकर आत्मा पावन पवित्र होती हैं इसके पूर्व पंडित हंसमुख जी ने कहा कि मेना सुंदरी ने जंगल में विराजित एक मुनिराज के सानिध्य में सिद्धचक्र विधान किया हमें धरियावद में पुण्य से 52 साधुओं का सानिध्य आगामी फागुन शुक्ला अष्टमी से आयोजित सिद्धचक्र विधान में प्राप्त होगा।इसके पूर्व प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी एवं आचार्य श्री वीर सागर जी को अर्घ्य समर्पित किए गए।आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के चरण प्रक्षालन का सौभाग्य गज्जू भैया,ब्रह्मचारी राजेश भैया ,वीणा दीदी, विकास भैया,सुरेश शाह पंडित हंसमुख ,शिखर चंद घाटलिया उदयपुर एवं परिवार को प्राप्त हुआ।इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने आचार्य श्री शिव सागर जी एवं आचार्य कल्प श्री श्रुत सागर जी का भावभीना स्मरण कर अनेक संस्मरण बताएं।विराट पूजन का सौभाग्य सजनदेवी कारुलाल ,अभिलाषा जंबू परिवार को प्राप्त हुआ।कार्यक्रम संचालन पंडित विशाल ने किया।राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया 9929747312

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