क्या नयी जैन पीढ़ी को जैन होना गौरवान्वित नहीं करता? स्वाति जैन हैदराबाद की कलम से
*रह रहकर फिर से वही सवाल मन में उठ रहा है कि क्या जैन लोग जैन धर्म की प्राचीनता और समृद्ध विरासत को भूलकर मिथ्यात्व की तरफ आकर्षित हो रहे हैं ?* ⁉️
*अडानी और विष्णु जैन जी को तो भूल जाइये क्योंकि उन्हें आज तक जैन मंदिर जाते हुये ना ही देखा और ना ही सुना लेकिन जिन नौनिहालों की परवरिश ही उस धार्मिक माहौल में हो रही है, जहां सोते, जागते, उठते, बैठते सिर्फ जिनेन्द्र प्रभु और जिन धर्म की बातें होती हों, जो परिवार जैन धर्म के बड़े हितैषी रहे हों अगर उन्हीं परिवारों की पीढ़ी अपना करोड़ों का दान जैन धर्म के संरक्षण और हजारों जैन साधर्मिक श्रावकों को खड़ा करने के लिए नहीं बल्कि जैन समाज के जाने-माने प्रतिष्ठित परिवार चेन्नई के श्री वर्धमान जैन जैसे कई जैन बंधु वैदिक मंदिरों को पोषित और पल्लवित करने के लिये देने लगे तो सवाल उठना लाजिमी है और ऐसी खबरें देखकर रोना भी आता है ।*

विदित हो कि वर्द्धमान जैन जी उस जैन परिवार के ध्वजवाहक हैं जो देश की गौरवशाली जैन परंपरा को आगे बढ़ाने में विशिष्ट स्थान रखता है और दक्षिण के जैन मंदिर और तीर्थों की सुरक्षा और संरक्षण में इस परिवार का महती योगदान है







सवाल फिर वही खड़ा होता है कि जिन लोगों की जैन धार्मिक भावना पर जैन समाज गौरव करता है उसी परिवार के बेटे यदि जैनधर्म की प्रभावना न करके तिरुपति मंदिर,जिसकी बागडोर हिन्दू समाज के लोगों के पास है और उनके धर्म के प्रचार-प्रसार में छह करोड़ रुपए श्री वर्धमान जैन व्यक्ति द्वारा दान दिया जाए तो अचंभा भी होता है और जैन समाज की चिंता भी होती है … सोचिए हमारा जैन समाज कहां जा रहा है ?*
आखिर यह स्थिति क्यों आ रही है?* ⁉️
* हमारी परवरिश में ऐसी क्या कमी रह जाती है कि हम अपने माता-पिता का दामन छोड़ किसी और के आंचल में अपना बसेरा ढूंढते हैं ?⁉️
जैन धर्म की प्राचीनता मौखिक नहीं है। हर दिन देश के अलग-अलग हिस्सों से खुदाई में निकलने वाली प्रतिमायें खुद अपने प्राचीन होने की गवाही दे रही हैं। जहां भी खुदाई होती है हर जगह सिर्फ वीतराग भगवान ही प्रकट होते हैं।
* हमें तो गर्व होना चाहिए जैन संतों की उस तपस्या, साधना और वीतरागता पर कि पंचमकाल में भी हमारे साधु जैन धर्म की इस कठोर चर्या के संवाहक बने हुए हैं।
लेकिन हम साधारण श्रावक – श्राविकाएं गृहस्थ जीवन में रहते हुये भी अपने धर्म की प्राचीनता को समझने में सक्षम शायद नहीं हुये हैं और इसलिए ही अपनी आने वाली पीढ़ियों को अपने धर्म की महत्ता और गौरवशाली इतिहास का ज्ञान नहीं करा पा रहे हैं।*
यह बहुत ही विकट स्थिति बन गयी है कि जैन समाज के श्रेष्ठ श्रावकों और प्रतिष्ठाचार्य जैसे परिवारों के बच्चे भी चमत्कारिक देवी-देवताओं में अपने भविष्य का समाधान ढूंढ रहे हैं और उसी ओर भाग रहे हैं ।*
जहां प्राचीन जिन मंदिर और प्रतिमायें अपने जीर्णोद्धार की राह देख रही हैं और अनेकों मंदिर इन्हीं वैदिक मतानुयायियों द्वारा अवैध तरीके से कब्जा लिये गये हों तब कुछ तथाकथित जैन बंधु हमारे इतिहास को अनदेखा कर और अपनी ही पीठ पर छुरा घोंपकर दूसरे धर्म में दान देकर उनकी राह आसान कर रहे हैं।
क्यों उस करोड़ों के दान को हम प्राचीन जैन मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए नहीं देते ?*⁉️
क्यों उस करोड़ों के दान को अपने किसी साधर्मिक भाई की मदद करने में नहीं लगाते?
क्यों उस करोड़ों के दान को जैन सेवा के नाम पर अस्पताल और विद्यालय खोलने में खर्च नहीं करते या फिर जैन विद्वानों को तैयार करने के लिये किसी श्रमण संस्कृति जैसे संस्थान को नहीं देते ?*
अगर बड़े जैन उद्योग पतियों को अपना पैसा सामाजिक कार्यों में दिखाना भी है तो , जैन धर्म में भी तो ऐसी बहुत सी संस्थायें हैं जो अच्छे सामाजिक कार्य कर रहे हैं ।
वहीं ये नयी जैन पीढ़ी जब बड़े मंचों और नेशनल चैनल्स पर ठोक – ठोक कर जैन धर्म की प्राचीनता पर उंगली उठाने लगे और उसे वैदिक धर्म का सिर्फ एक अंग बताने लगे तो फिर अफसोस ही करना रह जाता है।
इसलिए जरूरी है कि अपने बच्चों पर समय रहते ध्यान दें और उन्हें बतायें कि वो आगे आने वाले समय में जैन धर्म के प्रहरी हैं। इसलिए वो आस्था और श्रद्धा के नाम पर मिथ्यात्व का पोषण ना करें और उन्हें जिनत्व की शिक्षा देकर जैन धर्म का संरक्षण करने की ओर राह प्रशस्त करें।
समय रहते जागिये नहीं तो नई पीढ़ी ऐसे ही भटकती रहेगी ।
स्वाती जैन
हैदराबाद
7013153327
