मुनि श्री आदित्य सागर महाराज के शरणागत हुए अंतरराष्ट्रीय कथा वाचक पंडित प्रदीप मिश्रा जैन श्रमण संस्कृति एवं सनातन संस्कृति की दो अजस्र धाराओं के पावन समागम का साक्षी बना सीहोर नगर

धर्म

मुनि श्री आदित्य सागर महाराज के शरणागत हुए अंतरराष्ट्रीय कथा वाचक पंडित प्रदीप मिश्रा जैन श्रमण संस्कृति एवं सनातन संस्कृति की दो अजस्र धाराओं के पावन समागम का साक्षी बना सीहोर नगर
सीहोर
श्री विशुद्धकुल गौरव, अध्यात्मनभ आदित्य, श्रुतसंवेगी श्रमण श्री 108 आदित्यसागर मुनिराज के सीहोर प्रवास दौरान रविवार को मध्यान्ह 4 बजे अंतर्राष्ट्रीय विख्यात शिव कथा वाचक पंडित प्रदीप मिश्रा निर्विकार बालक वत दिगंबरत्व के दर्शनो की अभिलाषा से पूज्य श्रमण श्री संघ के शरणागत हुए ।

 

पंडित श्री मिश्र का मुनि वसातिका आगमन के अवसर पर सीहोर जैन समाज द्वारा भावभीना अभिनंदन किया गया।समिति द्वारा उन्हें पूर्ण सम्मान के साथ पूज्य मुनि श्री के दर्शनार्थ ले जाया गया जहां उन्होंने विराजित पूज्य मुनि श्री आदित्यसागार महाराज,मुनि श्री अप्रमितसागर महाराज एवं मुनि श्री सहजसागर महाराज को नमोस्तु निवेदित कर उनके सम्मुख श्रीफल अर्पित किया ।

आगंतुक शरणागत विद्वान पंडित प्रदीप मिश्रा को अत्यंत हर्ष भाव से समग्र मुनि संघ ने धर्मवृद्धि रस्तू आशीर्वाद प्रदान किया गया।

 

 

 

इस अवसर पर पं. मिश्र ने भावना व्यक्त की कि जैन श्रमण परंपरा के संवाहक पूज्य मुनि गणों के द्वारा प्रारंभ से ही अहिंसा परमो धर्म रूपी सिद्धांतों से जीव दया व शाकाहार से समन्वित शुभ संदेशों से भारतीय संस्कृति को गौरवान्वित व संरक्षित किया जाता रहा है जैन संस्कृति व सनातन हिन्दू संस्कृति भी इन्ही शाकाहार,जीव दया प्रेम व अहिंसा के मूल आधार पर अपना जीवन सात्विक व सदाचारी बनाकर समग्र विश्व को एक अनुकरणीय आदर्श प्रदान कर रही है और निश्चित ही इन्हीं सूत्र सिद्धांतों से ही समग्र विश्व में अमन और शांति का सुशासन स्थापित किया जा सकता है।जैन व सनातन संस्कृति धर्म रथ के दो समानान्तर चक्र है। एक के बिना दूसरा सदैव ही अधूरा है। आज मेरा सौभाग्य रहा कि पूज्य दिगंबर मुनिराजों के दर्शन उनके वरद आशीष के साथ मुझे प्राप्त हुए।

इस अवसर पर पूज्य मुनि श्री आदित्यसागर महाराज ने आशीर्वचन प्रदान करते हुए कहा कि धर्म ही जगत में जीव का सहायक होता है सनातन परंपरा में भी दिगंबर मुद्रा का बड़ा बहुमान है। मिश्र ने शिव कथा का वाचन करते है सनातन परंपरा में आराध्य भगवान शिव की भी दिगंबर स्वरूप के साथ आराधना की जाती है।वेदों में भी जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव व उनके दिगंबर स्वरूप का वर्णन मिलता है वेदों में ही उल्लेखित है कि इन्ही परमात्मा ऋषभ देव महाप्रभु के ज्येष्ठ पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत से ही इस आर्यावर्त की भूमि को भारत नाम प्राप्त हुआ।सनातन एवं जैन एक ही वृक्ष की दो मजबूत शाखाएं है।इन दोनो शाखाओं से ही धर्म का विस्तार होता है।दोनो ही परंपराओं में अहिंसा,सत्य,प्रेम,जीव दया,शाकाहार आदि के सिद्धांतो का दृढ़ता से पालन किया जाता है।

 

इस अवसर पर पूज्य मुनि श्री आदित्यसागर महाराज द्वारा पंडित मिश्र से फर्श से अर्श तक के उनके संघर्ष के दिनों के अनेक भावनात्मक वृत्तांत सुने जिसमे उन्होंने बताया कि दुख में संसार कितना स्वार्थी हो जाता है किंतु जब दुख संघर्ष का दौर समाप्त होता है तो वही स्वार्थी लोग आकर कदमों में झुक जाते है।

 

अत्यंत आत्मीयता से मुनि श्री ने व पंडित मिश्र ने परस्पर में अपने विचारों का आदान प्रदान किया। इस अवसर पर पूज्य मुनि श्री ने उन्हें अनेक धर्म ग्रंथ भेंट किए। लगभग आधा घंटा तक पूज्य मुनि श्री का सानिध्य प्राप्त कर पुनः आशीर्वाद ग्रहण कर पंडित मिश्र अनेक सुखद स्मृतियों के साथ अपने गंतव्य की ओर रवाना हुए।
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सिवनी में हो चुका चातुर्मास
उल्लेखनीय है पूज्य मुनि श्री आदित्यसागर महाराज का वर्ष 2021 में सिवनी नगर में अभूतपूर्व धर्म प्रभावना के साथ चातुर्मास संपन्न हुआ था।पूज्य श्री के सानिध्य में ही बड़े बाबा की रजतमयी वेदिका का निर्माण,रत्नमयी तीर्थंकर भगवंतो की वेदिका निर्माण, सेठ परिवार के मंदिरों का जीर्ण उद्धार,प्राचीन प्रतिमाओं का जीर्ण उद्धार भव्य पंचकल्याणक महोत्सव आदि अनेक वृहत समारोह आयोजन पूर्वक संपन्न हुए थे।
संकलित जानकारी के साथ अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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