अपने स्वभाव को प्राप्त करने का नाम ही धर्म है योगसागर महाराज

धर्म

अपने स्वभाव को प्राप्त करने का नाम ही धर्म है योगसागर महाराज
देवरीकला
सकल दिगंबर जैन समाज आयोजित कल्पदुम महामंडल विधान मेंमंगल प्रवचन देते हुए निर्यापक श्रमण मुनिश्री योगसागर महाराज ने कहा कि हम अभी भी विभाव में जी रहे है। अपने स्वभाव को प्राप्त करने का नाम ही धर्म है। पूर्व भव में जो कर्म संचित किए हैं उसी का आज फल मिल रहा है।

 

 

महाराज श्री ने कहा इतनी कडाके की ठंड में आप सभी विधान में बैठे हैं, पुण्य आश्रव का कारण है। एक दृष्टांत के माध्यम से बताया कि किसी नगर में गरीब रहता था, उसके पास कुछ भी नहीं था,एक बार इंद्र का विमान उस नगर से गुजर रहा था। उस गरीब पर इंद्र की पत्नी की नजर पड़ी तो उन्हें दया आ गई, और अपने पति इंद्र से कहा की इसकी मदद करो। यह बहुत गरीब है। तब इंद्र ने कहा किस किस की मदद करेंगे, संसार में ऐसे अनेकों लोग हैं। पुनः पत्नी के कहने पर कहा कि इसकी परीक्षा लेते हैं तो उन्होंने एक पोटली में कुछ स्वर्ण मुद्राएं रखकर उसके रास्ते से कुछ दूरी पर पोटली रख दी। वहां से गुजरा तो वह अंधे के भाती चला जा रहा था। वह पोटली के आगे बढ़ गया। उसकी नजर पोटली पर नहीं पड़ी। कारण यह था कि उसका कर्म क्षीण था।

महाराज श्री ने  कहा  आज आप दुकान खोलकर कमाई में तो लगे हैं, किंतु हमेशा यही कहते हैं की कम आई, कम आई संतुष्ट कभी नहीं हुए।

 

हम काम नहीं करते किंतु भगवान के सामने कामना करते हैं। यह संसारी प्राणी की दशा है। महाराज श्री के सानिध्य में हो रहे महामंडल विधान में आसपास के नगरों के एवं नगर के भक्त बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।

 

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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