कंठस्थ 750 श्लोक को 32 मिनट में सुना गए 14 वर्षीय जैन बालमुनी, आगम के ग्रंथ को सुना किया आश्चर्यचकित – अपना सुख छोड़कर दुखी की मदद करना ही सच्चा सुख – जैन मुनि डा. अजीत सागर

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कंठस्थ 750 श्लोक को 32 मिनट में सुना गए 14 वर्षीय जैन बालमुनी, आगम के ग्रंथ को सुना किया आश्चर्यचकित – अपना सुख छोड़कर दुखी की मदद करना ही सच्चा सुख – जैन मुनि डा. अजीत सागर
बारा

राजस्थान के बारां शहर के बोर्दिया परिवार के 14 वर्षीय कुलदीपक बालमुनी विजयचन्द्र सागर म.सा. द्वारा 2 वर्ष पूर्व ली गई दीक्षा के बाद पहली बार अपनी जन्मभूमि पर दीक्षा दिवस पर पहुंचें। तो परिवार समेत सकल जैन समाज तथा समाज के लोगों ने पलक पांवड़े बिछाकर जैन संतो के साथ उनका स्वागत सत्कार किया।


बता दें कि बालमुनि विजयचंद्र सागर अब तक 5000 हजार किमी. की पैदल यात्रा 5 राज्यो राजस्थान, गुजरात, मप्र. तमिलनाडु तथा कर्नाटक की दीक्षा लेने के बाद अब तक कर चुके हैं। दीक्षा के एक वर्ष बाद से ही बालमुनी मौन धारण कर ध्यान में लगे हैं।

 

बोर्डिया परिवार के कुलदीपक का बारां नगर में पहली बार आचार्य संतश्री नयनचंद्र सागर सूरी, सहस्रवधानी पूज्य गार्निव्री अजीत सिंह सागर एवं भागवत आदि ठाना के बारां पदार्पण होने के दूसरे दिन वहा पहुंचे पत्रकारों से मुखातिब हुए।
सहस्रवधानी पूज्य गार्निव्री डा. अजीत सिंह सागर ने बताया कि 2 साल पूर्व दीक्षा लेने वाले बाल मुनिश्री विजयचन्द्र सागर म.सा. ने अपनी दीक्षा की भावना जागृत की और पालीताणा में बालमुनि की दीक्षा हुई। परिवार ने उदारवादी से बाल मुनि को दीक्षा के लिए समर्पित किया। यही बालमुनि 2 वर्ष पूरे होने पर अपनी जन्मभूमि पर पधारे तो सभी सकल समाज ने बहुत-बहुत अनुमोदना की। मुनिश्री डा. अजीत सिंह सागर ने बताया कि दीक्षाधारी बालमुनी विजयचंद्र सागर ने आगम के 750 श्लोक के साथ कंठस्थ किया है और 32 मिनट में आगम के ग्रंथ को सुना कर आश्चर्यचकित कर दिया।

 

मुनिश्री डा. अजीत सिंह ने आशा व्यक्त कि की यह बाल मुनि आने वाले समय में काफी उपलब्धियां हासिल करेंगे, क्योंकि उनकी जो जिज्ञासा है और मोन साधना है उसका ही प्रतिफल है।उन्होंने बताया कि जैन शासन के 45 आगम में से एक आगम दर्शलिलोक के 750 कंठस्थ श्लोक याद है, वही शनिवार सुबह यही 750 कंठस्थ श्लोक मात्र 32 मिनट में धर्मसभा में सुनाएं। उनका मानना है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, गुजरात आदि राज्यों में बालमुनी अपने द्वारा कंठस्थ श्लोक के माध्यम से अपनी धर्मविद्या ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाएंगे। उन्होंने समाज और जनता को संदेश दिया है कि ज्यादातर लोग धर्म से जुड़े। दूसरे के दुख को भी अपना दुख माने। हर व्यक्ति अपने लिए जीवन जीता है पर अपनी चीज छोड़कर दूसरों के दुख सुख में काम आए वही जीवन है। दूसरों के दुख के लिए अपना सुख छोड़कर उनकी मदद करना ही सच्चा सुख है।
अमित जैन बारा से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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