दर्शन सागर महाराज की सल्लेखना पूर्वक समाधि 5:05 पर हुई

धर्म

दर्शन सागर महाराज की सल्लेखना पूर्वक समाधि 5:05 पर हुई
सुसनेर
दर्शन सागर जी महाराज जी की समाधि
पूर्व आचार्य श्री 108 दर्शन सागर महाराज की सल्लेखना पूर्वक समाधि त्रिमूर्ति जिनालय में 5:05 पर हुई
जिनकी अंतिम डोल यात्रा कल दिनांक 02/12/2024 सोमवार को प्रातः 9 बजे प्रारंभ होकर मेना रोड़, इतवारि या बाजार, शराफ़ा बाजार, शुक्रवारिया बाजार, साईं चौराहा होते हुए त्रिमूर्ति मन्दिर सुसनेर आएगी जहां पर अंतिम क्रियाएं विधि विधान के साथ संपन्न होगी।
एक परिचय

81 वर्षीय दर्शन सागरजी महाराज जिन्होने अपने जीवन में 188 पंचकल्याणक करवाए। 1972 में मुनि दीक्षा लेने के बाद से 47 सालो में अभी तक इन्होेने 2 लाख किलोमीटर की पद यात्रा कि। आचार्य श्री ने अपने जीवन में सुसनेर के सकल दिगम्बर जैन समाज को एक सूत्र में बांधे रखा, न सिर्फ समाज उत्थान के प्रयास किए, बल्कि मुम्बई में बने एक मंदिर की तर्ज पर सुसनेर के इंदौर-कोटा राजमार्ग पर ही त्रिमूर्ति मंदिर का निर्माण कर समाजजनो को धर्म से भी जोडे रखा।

उन्होंने अहिंसा धर्म के प्रचार के लिए
2 लाख किलोमीटर की पदयात्रा के दौरान आचार्य श्री ने अभी तक अपने जीवन में धर्म का ही अनुसरण करने की सीख समाजजनो को दी है। यही कारण है की सुसनेर का जैन समाज हर वर्ष अयोजित किया जाने वाला हर कार्य जैन संत आचार्य श्री दर्शन सागरजी महाराज के ही सानिध्य में ही करता आ रहा है।
उन्होंने सन 1972 में छुल्लक दीक्षा, आचार्य बनने के बाद 1973 में सुसनेर आए 9 अप्रैल 1972 को दिल्ली के समीप अतिशय क्षेत्र तिजारा में दर्शन सागरजी ने छुल्लक दीक्षा ली, उसके बाद 13 मार्च 1973 में राजस्थान के बुंदी में आचार्य श्री निर्मल सागरजी महाराज से मुनि दीक्षा ली। 13 अप्रैल 1973 को गणधर पद सांगोद राजस्थान में मिला। उसके बाद वे सुसनेर पहुंचे फिर 11 फरवरी 1983 में उत्तरप्रदेश के आगरा में आचार्य पद आचार्य श्री सुमतसागरजी महाराज ने प्रदान किया।

 

दर्शन सागरजी जब 1973 में जब मुनि थे तब ही सुसनेर पहुंच गए थे। तब से लेकर आज तक उन्होने अपनी संत साधना सुसनेर में ही की।
समाज धर्म से जुडा रहे इसलिए सुसनेर में ही किए 25 चातुर्मास
आचार्य श्री ने सकल दिगम्बर जैन समाज को धर्म से जोडे रखने के लिए समाजजनो के आग्रह पर अपने जीवन के 25 चातुर्मास भी सुसनेर में ही किए। सन् 1974 में मुनि बनने के बाद दर्शन सागरजी ने पहला चातुर्मास सुसनेर में किया था। कुछ चातुर्मास दिल्ली, इंदौर, कोटा, बुंदी, निवाई अजमेर, उज्जैन भी किए। यहां से उन्होने पद यात्रा कर कई विहार किए। सबसे अधिक चातुर्मास सुसनेर में ही किए।

*स्कूल व ट्रस्ट*
आचार्य श्री दर्शन सागरजी महाराज ने यहां के जैन समाज को शिक्षा व अन्य कारोबार से लेकर तमाम क्षेत्रो में उन्नति दिलाई। सुसनेर में ही जैन समाज के द्वारा आचार्य श्री दर्शन सागर महाराज ज्ञान मंदिर स्कूल के नाम से ही प्राइवेट स्कूल व ट्रस्ट भी संचालित है जो कि महाराज की प्रेरणा से समाजजनो के द्वारा संचालित किया जा रहा है।
उन्होंने 38 दीक्षाएं, जिसमें 15 मुनि और 20 छुल्लकजी , 3 आर्यिका माताजी प्रदान की । जीवन की अंतिम समय में प्रभु नाम स्मरण करते हुए एवं समस्त प्रकार के आहार का त्याग करते हुए संलेखना पूर्वक समाधि मरण किया।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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