संसार में सुख होता तो तीर्थंकर क्यों छोड़कर जाते मुनिश्री नीरज सागर

धर्म

संसार में सुख होता तो तीर्थंकर क्यों छोड़कर जाते मुनिश्री नीरज सागर

रामगंजमंडी

रामगंजमंडी के बाजार नंबर1 में स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर में संत शिरोमणि आचार्य श्री 108विद्यासागर जी महाराज के शिष्य एवम आचार्य श्री108 समय सागर महाराज के आज्ञानुवृति शिष्य मुनिश्री 108 नीरज सागर महाराज ने धर्म सभा मे प्रवचन देते हुए कहा कि इंसान ने साधनों को धर्म मान लिया है।जबकि धर्म आत्मा का स्वभाव है हम अभी तक साधनो में ही सीमित है धर्म तक पहुंचे ही नहीं। धर्म कभी भी कर्मों का बंध नहीं कराता है। धर्म से कर्मों का बन्ध टूटता है। श्री आदिनाथ जैन श्वेतांबर श्रीसंघ अध्यक्ष राजकुमार पारख ने बताया कि प्रवचन में बोलते हुए मुनि श्री 108 नीरज सागर ने कहा कि संसार में सुख होता तो”तीर्थंकर भगवान संसार छोड़कर क्यों जाते”संसार में मिले सुख क्षणिक व काल्पनिक है। दुख में थोड़ी कमी आ जाए तो आदमी उसे सुख समझ लेता है संसार में दुखी जीव को धर्म सुख देता है।

त्याग तपस्या और अरिहंत भक्ति से प्राप्त सौंदर्य क्रीम पाउडर से ज्यादा सुंदर होता है

मुनिश्री 108 नीरज सागर महाराज ने कहा कि त्याग और तपस्या और अरिहंत भगवान की भक्ति से मिला सौंदर्य क्रीम पाउडर से ज्यादा सुंदर होता है उन्होंने उदाहरण देते हुए संत शिरोमणि विद्यासागर जी का उल्लेख करते हुए कहा कि 50 वर्ष की साधना तपस्या और भक्ति की वजह से उनकी देह की चमक निराली दिखती थी ईर्ष्या पर विजय प्राप्त करना हर किसी के बस की बात नहीं है। स्त्रीया कोई भी बात को पचा नहीं पाती लज्जा और शील का पालन करने वाली स्त्री सती कहलाती है। अपने पति के अलावा पर पुरुष के बारे में सोचें नहीं और पर पुरुष को पिता या भाई के रूप में देखें उसे सती कहते है। बीस तीस वर्षों तक साथ रहने के बाद भी मनुष्य एक दूसरे पर विश्वास नहीं करता।

 

जिस घर में निर्णय लेने का अधिकार बुजुर्गो को वह घर टूटता नहीं मुनिश्री निर्मद सागर महाराज

धर्म सभा में प्रवचन देते हुए मुनिश्री 108 निर्मद सागर महाराज ने कहा कि जिस घर मे निर्णय लेने का अधिकार बुजुर्गो को होता है वह घर कभी टूटता नहीं है अपने कार्य को कर्ता बनकर नहीं कर्तव्य मानकर करे परिवार मे रहो तो दूध पानी की तरह रहना चाहिए कम क्षमता वाला भी अपने आपको क्षमताशील मान रहा है आज का इंसान परिवार मे तेल के समान रह रहा है सबसे बड़ा धर्म परिवार के प्रत्येक सदस्य को खुश और संतुष्ट रखना बताया दान करने को अच्छा बताते हुए मुनि श्री निर्मद सागर ने कहा कि दान करने से पहले अपने कमजोर भाई की मदद कर उसे ऊपर उठाने का कार्य करे ऐसी भावना रखो की सबका भला हो।

मन और आत्मा को सुन्दर बनाना है तो लोभ और तृष्णा का त्याग करना पडेगा, जो मेरे पास है वह जावे नहीं इसे लोभ कहते है। और जो मेरे पास नहीं वह प्राप्त हो जावे उसे तृष्णा कहते है। हर परिस्थिति मे धेर्य को धारण करे जितना बड़ा संघर्ष होगा जीत उतनी ही बड़ी होगी।

लक्ष्मी और सरस्वती का महत्व बताया

श्वेताम्बर श्रीसंघ अध्यक्ष राजकुमार पारख ने बताया कि प्रवचन मे मुनिश्री निर्मद सागर महाराज ने कहा कि इंसान समझता है की लक्ष्मी की वजह से उसकी पहचान है, लक्ष्मी चंचल है आती जाती रहती है। सरस्वती आसानी से आती नहीं लेकिन आने के बाद जाती नहीं है। सम्मान लक्ष्मीजी का करना लेकिन विश्वास हमेशा सरस्वती जी का करना परन्तु मनुष्य करता इसका उल्टा है। लक्ष्मी बचाने का उपाय बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि जहा पर प्रतिदिन गुरुओ की पूजा होती है और क्लेश नहीं होता शांति रहती है वहा लक्ष्मी निवास करती है। मनुष्य के चार गति मे भ्रमण करने का कारण कषाय है और दुखो का मूल कारण परिग्रह है वस्तु का अपना मान लेने से दुख आता है।

प्रवचन उपरांत मुनिश्री 108 निर्मद सागर महाराज ने श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर श्रीसंघ अध्यक्ष युवादल राजकुमार पारख को अपने पास बुलाकर बिठाया और शाम 6 बजे होने वाले चोसठ रिद्धि मंत्र विधान मे मुख्य जजमान की भूमिका निभाने का आमंत्रण दिया वही मुनिश्री 108 निर्मदसागर ने दिगम्बर श्वेताम्बर समाज मे एकता बनी रहे इस तरह का कार्य करने की सीख दी प्रवचन मे सर्वप्रथम मंगलाचरण प्रतिभा जैन सिंगोली ने प्रस्तुत किया धर्मसभा मे सेकड़ो समाजजन महिलाए और बच्चे उपस्थित रहे।
अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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