हम जिस स्थान पर रहते हैं तथा जैसे लोगों से मिलते हैं उसका प्रभाव हमारे ऊपर पड़ता है प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक वस्तु का अपना आभामंडल होता है जिसे हम ओरा के नाम से जानते हैं प्रमाण सागर महाराज

धर्म

हम जिस स्थान पर रहते हैं तथा जैसे लोगों से मिलते हैं उसका प्रभाव हमारे ऊपर पड़ता है प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक वस्तु का अपना आभामंडल होता है जिसे हम ओरा के नाम से जानते हैं प्रमाण सागर महाराज
इंदौर
हम जिस स्थान पर रहते है तथा जैसे लोगों से मिलते है उसका प्रभाव हमारे ऊपर पड़ता है,कही जाने से हमें सकारात्मक प्रेरणा मिलती है तो कही हम नकारात्मकता से भर उठते है।”प्रत्येक व्यक्ती तथा प्रत्येक वस्तु का अपना अपना आभामंडल होता है,विशेष व्यक्ती का विशेष तथा सामान्य व्यक्ति का सामान्य आभामंडल हुआ करता है जिसे आजकल हम लोग “ओरा” के नाम से जानते है।

 

उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने “भक्तामर स्त्रोत्र” में भामंडल प्राप्तिहार्य की व्याख्या करते हुये व्यक्त किये”*

उन्होंने कहा कि भगवान के भामंडल का प्रभाव ही ऐसा होता है कि उसके आगे सभी पदार्थ निस्तेज हो जाते है।उन्होंने कहा कि महापुरुषों के शरीर से उनके मस्तक के चारों ओर से वर्तलाकार पीली किरणें निकला करती है,और उसका अपना प्रभाव होता है जैसे जब हम किसी संत के चरणों में जाते है तो उसके दिव्य प्रभाव से प्रचंड क्रोधी व्यक्ति भी शांत हो जाता है और जब हम किसी नकारात्मक या क्रोधी व्यक्ति से मिलते है,उसकी नकारात्मकता का प्रभाव हमारे ऊपर पड़ता है। आजकल तो कुछ ऐसी डिवाइस भी निकल गयी है जिसके आधार पर व्यक्ति के आभामंडल का चित्रण किया जा सकता है।उन्होंने रूस के वैज्ञानिक किलियान और डार्लकिप का उदाहरण देते हुये कहा कि उन्होंने किलियान थैरेपी के नाम से नयी थैरेपी विकसित की जिसमें व्यक्ति केआभामंडल से निकलने वाली किरणों का चित्र खींचा जाने लगा तथा उससे व्यक्ति को जो बीमारीछह माह बाद आयेगी उसकी जांच अग्रिम की जाने लगी। मुनि श्री ने कहा कि भाव तरंगों के माध्यम से आपकी भाव धारा को प्रकट करने का यह एक माध्यम है,उसी प्रकार भगवान के भामंडल की जो चर्चा आचार्य श्रीमानतुंग ने की उसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है भगवान का दिव्य प्रभाव ही ऐसा है कि उसके आगे सभी पदार्थ सूर्य और चंद्रमा भी निस्तेज हो जाते है तथा भगवान के उस “भामंडल” में व्यक्ति को अपने सात भव नजर आते है मुनि श्री ने उदाहरण देते हुये कहा कि जैसे जब कभी किसी व्यक्ती की चेतना के घनीभूत हो जाती है तो उसकी स्मृति जाग उठती है उसे उसके पूर्व भव की स्मृति हो उठती है ऐसी घटनाओं को पूर्व जन्म की घटनाओं के रुप में देखा जाता है। भगवान जब समवसरण में विराजमान होते है तो उनकी वाणी दिव्य ध्वनि के रुप में धन्यात्मक ओमकार रुप निकलती है जो बाहर आते ही 18 भाषाओं तथा 700 लघु भाषाओं में परिवर्तित होकर जो जिस भाषा का जानने वाला होता है उसे उसी भाषा में मिल जाती है।

 

जैसे शब्दों के माध्यम से यहा से कह रहा हूं लेकिन आजकल तो ऐसी टेक्नोलॉजी है कि आप इसे जिस भाषा में सुनना चाहे उस भाषा में मात्र एक बटन के दवाने पर सुन सकते है। यह टेक्नोलॉजी जो आज है वह तो पहले से ही थी मात्र यह “ज्ञान का विषय” आज बना है ऐसा समझना चाहिये।

उपरोक्त जानकारी धर्म प्रभावना समिति के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी तथा मीडिया प्रभारी राहुल जैन ने देते हुये बताया भक्तामर स्त्रोत्र की वाचना पूर्ण होंने जा रही है समिति के अध्यक्ष अशोक डोसी,नवीन गोधा तथा महामंत्री हर्ष जैन ने इसे एक पुस्तक के रुप में प्रकाशित करने का निर्णय लिया है जो कि दीपावली के पश्चात श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान की शुरुआत में सभी के हाथों में होगी।कार्यक्रम का संचालन दशम प्रतिमाधारी बाल ब्र.अशोक भैया लिधोरा ने किया।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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